Wednesday, 30 April 2014

मेरा प्रश्न

रात के एक बजे कमरे में कोई रोशनी नहीं थी। और मेरी आँखों से नींद के चिह्न भी नदारद थे। देश के राजनीतिक परिदृश्य पर विचार करते हुए मेरे मन में यूँ ही एक सवाल उठा। और उसका जवाब मुझे अभी तक नहीं मिल पाया है।

प्रश्न है, कि "मूर्खों के देश में राजा अधिक मूर्ख होता है, या प्रजा?"

-टिम्सी मेहता

Wednesday, 16 April 2014

ओ नदी, बताओ न!

सुन्दर प्रदेश में भ्रमण करते हुए नैन और मन दोनों प्रसन्न थे। हरित मार्ग के मध्य, दूर कहीं एक नदी के होने का आभास हुआ। मन में वेगपूर्वक एक विचार उठा, और स्वयं से बतियाने का सिलसिला शुरू हो गया।
 

मन ही मन मैंने नदी से कहा, कि यूँ बलखाती-सी, तुम बहती चली जाती हो। निर्मल, शीतल जल से भरी, दो किनारों के मध्य, अपनी सीमाओं का सम्मान करती, तुम कितनी श्रेया और प्रिया लगती हो! तुम्हारी निर्बाध, प्रवाहमान शैली पर कितनी कवितायें रच दी गयी। जल से भरी तुम, अनंत प्रेरणाओं की स्रोत हो। पर बताओ, क्या कभी किसी पुष्पित बगिया के मध्य बने किसी सुन्दर सरोवर से तुम्हे ईर्ष्या नहीं होती?
 

'अपनी मति-अपनी गति' की उत्कंठा तो शायद उस सरोवर के मन में भी तुम्हे देखकर प्राय: उठा करती रही होगी। पर कहो, तुम भी कभी तो सिमटना चाहती ही होगी! कठोर चट्टानों से संघर्ष तो हर दिन करती ही हो, नित नव मार्ग खुद के रचती ही हो, पर कभी तो तुम भी रुकना चाहती होगी! कभी तो मन में चाह की हूक उठ ही जाती होगी कि तुम्हारी परिधि का भी कोई मनमोहक पुष्पों से सिंगार करे! मृग-शावक तुम्हारे इर्द-गिर्द निर्भीक होकर कुलांचें भरें! मग्न होकर प्रियजन तुम्हारे आँगन में विहार करें! कोई मनोहर संगीत रचे, कोई मृदु गीत गुनगुनाये, कोई तुम्हारे पास झुककर अपनी अंजुली भरकर पूरे उद्यान में जलबिंदुएं बिखरा दे! और हास्य-ठिठोली की मधुर ध्वनि से पूरी बगिया गुंजायमान हो उठे!
 

सरल साध्वी-सी बहती ओ नदी! बताओ न, क्या कभी तुम यों राजसी श्रृंगार से युक्त हो, पटरानियों की भांति इठलाने की नहीं सोचा करती? मेरे प्रश्नों की बौछार से भी तुममे कोई उफान नहीं आया। यूं ही शांत बहती रहोगी, या कुछ उत्तर भी दोगी?

Monday, 31 March 2014

सुच्चा मोती बना ...

टूटा था तारा कहीं,
छूट के गिरा जो
आसमां के दामन से। 

देख उसे मन में
एक ख़ाब संजो लिया
आस के जोबन से।   

सुच्चा मोती बना
मन में था संभाला
बड़े जतन से। 
 
टूटा जो मोती आज,
बह के आ निकला वो 
आँखों के आँगन से...

ज्य़ादा तड़पाते हैं
ये टूटे मोती, देखो…
काँटों की चुभन से। 

:- टिम्सी मेहता

Sunday, 9 March 2014

अपने देश के लिए

चुनाव का समय व्यवस्था-परिवर्तन का अवसर देता है। देश का अगुआ सच्चा होगा, तो ही विकास की आशा की जा सकती है। अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्र-हित के बारे में सोचना ही इस समय की माँग है।

अगर हम सच्चे भारतीय हैं, तो उस पार्टी को वोट न दें, जिनके समर्थन से हमें नौकरी मिल सकती है या हमारा ज़ब्त हुआ लाइसेंस वापिस मिल सकता है। वोट उस पार्टी को दिया जाए, जो सचमुच में नेतृत्व के योग्य है, और जिसके शासन में देश के दबे हुए वर्ग को भी न्याय मिल सके।

देश का विकास सिर्फ बातों के पुल बनाने से नहीं होगा। जिनका काम बोल रहा है, उन्हें ही अवसर देने में भलाई है। एक भारतीय नागरिक की भूमिका में होते हुए हमारा कर्तव्य है कि हम देश के हालात को समझें, और सत्य का ही समर्थन करें!

इतना प्रयास तो हम लोगों को करना ही चाहिए!    

-टिम्सी मेहता

Monday, 27 January 2014

ज़िंदगी की शक्ल

कच्ची-पक्की पगडंडियों पर 
पलती ज़िंदगी
है तो बिलकुल 
मोम सी..
पिघले जाती है 

पलों की आंच में,
और 

पलों के दरमियान ही
जम जाती है 

आधी-टेढ़ी होकर..
हैरां-परेशां आँखों की जोड़ी
पलकें 

झपका भर पाती है,
और
ज़िंदगी की 
शक्ल बदल जाती है.

-टिम्सी मेहता

कच्ची-पक्की पगडंडियों पर...

कच्ची-पक्की पगडंडियों पर
ही पलती है
ज़िंदगी.
थोड़ी आकाश की बर्फ,
और 

थोड़ा नमक मिट्टी का   
ज़रूरी है 
स्वाद के लिए
ज़िंदगी की थाली में.. 

Thursday, 23 January 2014

संस्कार

निशा के लिए इससे ज्यादा मुश्किल स्थिति क्या हो सकती थी, कि जब उसके पिता कैलाश नाथ एक चुनावी पार्टी के मुख्य चेहरा थे, और ससुर आलोक नाथ दूसरी पार्टी के! पार्टियां दोनों ही टक्कर की थी, इसलिए किसी भी एक को नकारना आसान नहीं था। ससुर चाहते थे कि बहु उन्हें ही अपना वोट दे और पिता भी चाहते तो यही थे कि बेटी का वोट अपने पिता को ही मिले, परन्तु वे भी पसोपेश की स्थिति में ही थे।
चुनाव का समय निकट आ रहा था। एक दिन निशा के पिता कैलाश नाथ अपनी बेटी के ससुराल आये हुए थे। दोनों समधि साथ बैठ कर चाय पी रहे थे, जब आलोक नाथ मन की बात पूछ बैठे। "निशा बेटी, तुम अपना वोट किसे दोगी? मुझे या कैलाश नाथ को ?"
निशा एक मिनट के लिए मौन रही। फिर गम्भीर मुद्रा में हो कर बोली, कि मैं तो अपने पापा को ही वोट दूँगी। आलोक नाथ का चेहरा यह सुनकर फ़क् सफ़ेद पड़ गया। खुद कैलाश नाथ से भी कुछ कहते न बना। और यह देख कर निशा ने ही चुप्पी तोड़कर बोलना शुरू किया।
"ससुर जी, अगर आप चुनाव जीतेंगे, तो घर में करोड़ों रुपये आ जायेंगे। लेकिन पापा के यहाँ धन नहीं आ पायेगा। पापा जीतते हैं तो उनके पास करोड़ों रुपये आयेंगे। आपका पैसा उनको नहीं दिया जा सकता क्योंकि वो पैसा बेटी के ससुराल से है। मुझे पता है कि मेरे पापा बेटी के घर का पैसा नहीं लेंगे। लेकिन उनके घर का धन तो आपको दिया जा सकता है न! नतीजा, दोनों घरों को धनलाभ हो सकेगा!"
निशा के ससुर यह सुनकर भावुक हो उठे। "कैलाश नाथ, पिछले जनम में ज़रूर कुछ अच्छे करम किये होंगे जो तुम जैसा समधि मिला है। मैं धन्य हो गया, कैलाश नाथ !"
कैलाश नाथ की आँखें भी भर आई। "बेटियां होती ही ऐसी हैं! 'संस्कारी'!"
"सच कैलाश नाथ, संस्कार सिर्फ आलोक नाथ ही नहीं, कैलाश नाथ भी दिया करता है।"आँखें पोंछते हुए आलोक नाथ धीरे-धीरे बुदबुदाये। 

रिटन वैल बाय टिम्सी मेह्टा :P

Tuesday, 10 December 2013

"मैं कौन हूँ ? कहाँ हूँ मैं?"

कुछ ही दिन पहले की बात है। रात होने जा रही थी। आँगन में अँधेरा था। किसी काम से आँगन में जाना पड़ा तो अँधेरे के कारण एक खम्बा मुझे दिख न सका। फिर क्या होना था, ज़ोर से चिल्लाने के दो मिनट बाद जब होश संभाला तब मुझे पता चला कि मेरे सर पर ज़ोर से चोट लगी है।

"मैं कौन हूँ ? कहाँ हूँ मैं?", जल्दी-जल्दी खुद से सवाल किया। जवाब सही मिला तो जान में जान आई। शुक्र मनाया मैंने कि याद्दाश्त नहीं गयी।
कुछ दिन तक ज़ोरदार सरदर्द रहा, पर अब बिलकुल ठीक हूँ। सब कुशल-मंगल है। यह महत्त्वपूर्ण समाचार देर से देने के लिए क्षमा करें, पर मैं भी क्या करूँ! मुझे छोटी-सी चोट लगने के बाद जिस तरह से मुझे बधाई देने वालों का . . . म. म. मतलब हाल-चाल पूछने वालों का जो ताँता लग जाता है, उसे संभाल पाना मुश्किल हो जाता है।

तो . . . बस यही बताना था। हो गया।

Wednesday, 6 November 2013

आज की ताज़ा ख़बरें...

कई बार लोग पूछते हैं कि आज सुबह नाश्ते में क्या लिया। मेरा जवाब होता है, समाचार-पत्र लिया। सही ही तो है, समाचार-पत्र न पढ़ा तो दिनभर अधूरापन महसूस होता रहता है। आज सुबह समाचार-पत्र  का नाश्ता बहुत स्वादिष्ट लगा, पर पता नही अपच से खट्टी डकारें क्यों आ रही हैं सुबह से। कुछ ख़बरें हो जाएँ!
मुखपृष्ठ पर तो आज सचिन के सिवा कुछ है ही नहीं! और, सचिन के नाम के स्थान पर 'भगवान' शब्द का प्रयोग बहुत खूब लगा। आज खुश तो बहुत हुए होंगे भगवान् (आकाश वाले) अपने इतने महिमा-मंडन पर!  
विदाई के उपलक्ष्य में सचिन जी को सोने का एक सिक्का, और सोने के 199 पत्तों से सजा चांदी से बना बरगद का पेड़ भेंट किया जायेगा। अच्छा लगता है यह सब पढ़कर। आखिर सचिन एक बेहतरीन खिलाड़ी हैं, क्रिकेट जैसे खेल में रन बनाना कोई आसान काम है क्या! पिच पर दौड़ते-दौड़ते ही पसीने छूट जाते हैं! इस विषय को आगे देखेंगे, अभी एक और समाचार पर चर्चा हो जाए।
450 करोड़ की लागत वाला मंगल अभियान का पहला चरण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस पर अपनी टिप्प्णी देते हुए समाचार-पत्र की ओर से कहा गया है कि "इस तरह के भी स्वर सुनाई पड़ रहे हैं कि भारत को ऐसे किसी अभियान में अपनी ऊर्जा और संसाधन खपाने के बजाय अपना सारा ध्यान गरीबी, अशिक्षा और ऐसी ही अन्य समस्याओं को दूर करने में लगाना चाहिए था। यह महज आलोचना के लिए आलोचना वाले स्वर हैं, क्योंकि समग्र विकास के लिए यह आवश्यक है कि देश सभी क्षेत्रों में तरक्की करे। "
समाचार-पत्र जी! आपका कहना एकदम सही है, आज मंगल के मिशन को प्रारंभिक सफलता मिली है। कल पूरी सफलता मिल ही जायेगी। इसके बाद हम वहाँ जीवन हेतु शोध करेंगे। शोध के सकारात्मक परिणाम भी जल्द ही मिलेंगे। फिर एक दिन हम जैसे रईस लोग वहाँ ज़मीन खरीद कर बड़े-बड़े महल और मॉल बनाएंगे। इसके बाद विदेशों में बसना तो पुरातनपंथी लोगों का ही स्वप्न हुआ करेगा, हम आधुनिक लोग तो मंगल पर ही रहना चाहेंगे! आलोचना करने वाले तो बस आलोचना करते रह जाएँगे, उन्हें अनसुना करने में ही अकलमंदी है। 
हूँ! तो… अभी के लिए एक बार गरीब को आलू-प्याज़ में ही उलझने दिया जाए, कारण यह है कि इस समय धन की ज्यादा आवश्यकता अमीरों को है, क्योंकि उन्हें मंगल पर रहने के लिए ज़मीन खरीदनी है, और उसके लिए धन तो चाहिए ही! तो इसलिए एक बार सचिन जी (भगवान् जी) को ही धन-स्वर्ण दे दिया जाए! गरीबी-अशिक्षा इत्यादि समस्याएँ देश के समग्र विकास के बाद देख ही ली जायेंगी! गारंटी से!  
अभी तक जो अपच हो रही थी, उसके साथ ही अभी-अभी सरदर्द भी होने लगा है। चिंता से। सचिन जी के लिए चिंतित हूँ। महंगाई के इस दौर में उनका गुज़ारा इतने कम सोने से कैसे हो पायेगा? उधर सोने के लिए किले के पास क़ी खुदाई भी अब…खटाई में पड़ गयी-सी है!! खैर.. अब तो मंगल से ही मंगल की आशाएं जुड़ी हैं! देखें!

:- टिम्सी मेहता

Thursday, 31 October 2013

समाचार-पत्रों में प्रकाशित लेख



कैसी हो दीपावली ...


मिठास एवं प्रकाश के साथ माता लक्ष्मी का स्वागत करने का राष्ट्रीय पर्व है दीपावली। और न जाने क्यों हम हर मायने में इस पर्व के मायने उलट रहे हैं! मिठास हेतु जो मिष्ठान्न बाज़ार से लेते हैं, उनमें कृत्रिम रंग और कीटनाशकों की मात्रा बढ़ती जा रही है, पर किसी पर असर नहीं है। प्रकाश हेतु मिट्टी के पारम्परिक दीये कहीं दिखते ही नहीं हैं, जिनसे कुम्हार को भी रोज़गार प्राप्त हो पाता! बिजली की लड़ियों में सुंदरता तो है, पर स्वाभाविकता नहीं!
बाकी रही माता लक्ष्मी के स्वागत की बात, रात भर बारूद-पटाखे फोड़कर मेहनत से कमाये धन को भस्म करके समृद्धि की देवी को कैसे प्रसन्न किया जा सकता है, समझ में नहीं आता।
घर पर ही मावे और मेवे से स्वादिष्ट पकवान बनाकर, मिट्टी के नन्हे दीपक जगमगाकर इस पर्व को प्रियजनों-मित्रों के संग मनाया जाए, और इसके साथ ही कुछ मिठास और प्रकाश दरिद्र-नारायण को भी अर्पण की जाए। झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले छोटे-छोटे बच्चों की आँखें जब मिठाई देखकर टिमटिमाने लगती हैं, तब मन में प्रसन्नता का प्रकाश स्वयं ही भर उठता है। अगर ऐसी हो दीपावली, तो आनंद ही कुछ और हो!




Wednesday, 16 October 2013

ये मेरी हॉबी...

मेरी हॉबी है, रोज़ शाम को अपनी द्विचक्रिका (साइकिल) के आगे लगी टोकरी में रंग-बिरंगे फूलों का एक सुन्दर-सा गुच्छा सजाकर, (हवाई) सैर के लिए निकलना। और उसके बाद रस्ते-भर मस्ती से हीरोइनों की तरह प्यारे-प्यारे गीत गुनगुनाते जाना। मगर आजकल ये मेरी हॉबी मुझे परेशां-परेशां-परेशां करने लगी है। कारण??
 

'मच्छर' !

मौसमी मच्छरों की इस साल ऐसी ज़बरदस्त पैदावार हो रही है, कि रस्ते पर साइक्लिंग करते हुए गाना गाने के लिए ज़रा-सा मुँह खोला नहीं, कि … ईईईई …… ईईईई…………   !!!

प्रिय हस्ताक्षर :-

टिम्सी मेहता :) :P

Friday, 11 October 2013

मेरे देश की बातें....

लम्बी यात्रा के बाद आज घर-वापसी हुई। कई शहर पार करते हुए, खेत-खलिहानों के मध्य, एक छोटे-से गाँव में एक औपचारिक कार्यक्रम से जाना हुआ था। जिस शांति-नीरवता का ज़िक्र अक्सर ग्राम्य-जीवन के साथ किया जाता है, ठीक उसी शांति-ठहराव का अहसास वहाँ हुआ। गाड़ियों का शोर-शराबा तो दूर-दूर तक नही, कच्चे रास्तों पर पैदल चलने का अनुभव अच्छा लग रहा था।
कहीं कौवों की काँव-काँव सुनाई दे रही थी, और कहीं रँभाती हुई गाय नज़र आती थी। अपनी मस्ती में घूम रहे छोटे-छोटे बच्चों को रस्ते भर निहारा, उनकी स्वाभाविकता सचमुच एक दुर्लभ दृश्य के जैसी प्यारी प्रतीत हो रही थी। मौसम बहुत अनुकूल न था, और हमारे पास समय भी बहुत कम था। सो इस शुद्ध वातावरण का जितना लुत्फ़ लिया जा सकता था, उतना लिया नहीं गया।
जिनके यहाँ हम गए थे, वहाँ बिजली नदारद थी। इसलिए हाथ वाले पंखे झलकर गर्मी दूर करने के प्रयास करते हुए बचपन के वो छूटे हुए दिन याद आ गए, जब हमारे यहाँ जनरेटर-इनवर्टर नहीं हुआ करते थे। बातों-बातों में हमारे मेजबान ने बताया, कि यहाँ गाँव में तो दिन में दो ही घंटे के लिए बिजली के दर्शन होते हैं, और यह भी पता नही,
कि वो दो घंटे कौनसे होंगे। 
अपनी रौ में वो तो और भी बहुत-सी बातें कहते चले गए, पर मेरा ध्यान तो उनकी उस एक बात ने ही अवरुद्ध कर दिया। गाँव में दिन में सिर्फ दो घंटे बिजली देने का क्या अर्थ हुआ, यह मुझे समझ नही आ सका। उमस भरे मौसम में, क्या गाँव वालों को गर्मी नहीं लगती? और शहर वालों के लिए बिजली की भला ऐसी क्या भारी ज़रूरत होती है, जो गांववालों की नहीं होती?
दिन-रात
मिट्टी में मिट्टी होकर जग-भर के लिए अन्न उगाने वाले किसानों के लिए मेरे यहाँ बिजली तक उपलब्ध नहीं है। मन में बहुत कुछ आया, जो यहाँ लिखने की इच्छा नहीं हो रही! कम शब्दों में, मुझे बहुत ही ख़राब लगा यह सुनकर।

Sunday, 25 August 2013

चिकित्सक यानि जीवनदाता???

चिकित्सक को भगवान का रूप माना जाता है। भगवान् के इस रूप के दर्शन पिछले कुछ महीनों से मुझे कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं, कभी अपनी ही किसी छोटी-मोटी समस्या से, तो कभी किसी संगी-साथी की तकलीफ के कारण। हर बार एक अजीब बात समान रूप से मुझे दिखती है। आजकल चिकित्सक रोगी से यह नही पूछते कि क्या हुआ, क्या समस्या है! वरन खुद ही कुछेक सवाल कर लेने के बाद, कोई टेस्ट (परीक्षण) कराने की सलाह (निर्देश) दे देते हैं, और उसके बाद अगले रोगी को देखने लगते हैं।
परीक्षण के नतीजे देखने के बाद रोगी को दवाओं की एक लम्बी-सी पर्ची थमा दी जाती है, बिना ही उसे यह बताये, कि उसे हुआ क्या है। और इसके साथ ही, दस-पंद्रह दिन के पश्चात पुन: दर्शन हेतु आने को बता दिया जाता है।
अपना-सा मुँह लेकर हर बार हम बाहर निकल आते हैं।

ये सब देखकर मेरे मन में विचारों की उठापटक तो होनी ही है, सो होती ही है। चिकित्सक यानि जीवनदाता। जब कोई गंभीर समस्या से जूझ रहा होता है, तो उसे जीने की आशा ले कर जाती है चिकित्सालय की ओर। कहते हैं, कि अपने हिस्से की साँसें तो हर कोई गिनवा कर ही लाया करता है न कोई इन साँसों की संख्या बढ़ा सकता है, और न कोई घटा ही सकता है। लेकिन स्वास्थ्य की पटरी से उतरी जीवन की रेल को पटरी पर वापिस तो ला ही सकते हैं चिकित्सक। बेबस रोगी स्वास्थ्य की आशा लेकर चिकित्सक के पास आते हैं, और पूर्ण समर्पण कर देते हैं। अपने जीवन को बचाने के लिए किसी पर कितना विश्वास कर के आये हुए होते होंगे वे! अपने दिमाग की बत्ती को हर समय जगाये रखना, सही समय पर सही तरीके से रोग दूर करने का उपाय करना, और पूरी सजगता से रोगी के स्वास्थ्य-सुधार पर नजर रखना, चिकित्सक का यह काम कतई आसान नहीं है! दवाई जरुर वे कड़वी-कड़वी देते हैं, पर मीठे-मीठे जीवन को बचाने के लिए यह कोई बड़ी दिक्कत वाली बात नहीं है।
पर जहां दुनिया का सबसे महान काम हो रहा है, वहां नोटों की चकाचौंध आ जाए तो कुछ गड़बड़ हो ही जाती है। कई बरस पहले की एक छोटी-सी बात भी कहीं से याद आ रही है। मेरी दादीजी एक चिकित्सक के क्लिनिक पर दवा लेने के लिए गयी। क्लिनिक के बाहर नीम्बू-मिर्ची टंगे दिखे तो उन्होंने पूछा, कि डाक्टर साहब, यह किसलिए? चिकित्सक ने उत्तर दिया, कि इसे टांगने से धंधे में बरकत रहती है। दादीजी ने पलटकर सवाल किया कि तब तो आप यही चाहते होंगे कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग बीमार पड़ते रहें, ताकि आपके यहाँ मरीजों की कतार लगी रहे। चिकित्सक से इस सवाल का कोई जवाब न बना, उसका मुंह देखने लायक था। प्रकट रूप से ऐसा प्रश्न शायद उस चिकित्सक ने कभी अपेक्षित नहीं किया होगा। पर उत्तर तो सब समझ ही गए थे। मेरी जानकारी के बहुत से चिकित्सक हैं जो अपना चिकित्सा धर्म पूर्ण निष्ठा से निभाते हैं। पर समाज के कुछ गलियारों में ऐसे भी कुछ चेहरे हुआ करते हैं, जो इस जीवनदाता की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा ही देते हैं। ऑपरेशन बिना जरूरत के ही कर दिया जाए! और ऑपरेशन के कई बरस बाद यदि मरीज़ को मालूम हो पाए कि उसके शरीर से एक गुर्दा चोरी हो चुका है, तो कैसा लगता होगा उसे! 
ऐसी बहुत-सी और भी बातें होती हैं जो हर बार अखबारों की सुर्खियाँ तो नहीं बन पाती, लेकिन जब हमारे आस-पास घटित होती हैं तो मन बहुत दुखता है। पैसा इतनी भी बड़ी चीज़ तो नही होती कि जिसे सामने वाले के विश्वास की आड़ में ऐंठ लिया जाये! कोई हमे इंसानी स्तर से इतना ऊपर, अपना 'भगवान' बनाने को तैयार बैठा है, पर हम इंसान से भी नीचे के स्तर के कुछ बनने में कितने खुश हो जाते हैं! नैतिक पतन का इलाज अब कौन सा चिकित्सक कर पायेगा?

Sunday, 23 June 2013

हम गर्वीले भारतीय..

पहाड़ों पर भूखे-प्यासे भटक रहे लोगों को रोटी का एक टुकड़ा भी देने से साफ़ इनकार कर दिया। आग जलाने के लिए माचिस की एक तीली-भर देने को भी मना कर दिया। अपने इस बर्ताव से पहाड़ी लोगों ने यह बता दिया कि उनका मन भी पहाड़ के ही जैसा विशाल है। मुसीबत के मारे लोगों का पैसा-सोना लूट-लूट कर उन्होंने यह भी स्पष्ट समझा दिया कि भारत को संस्कृति के मामले में विश्वभर में ऊंचा स्थान क्यों दिया जाता है। पर यह कटाक्ष पहाड़ी लोगों के ही लिए है, ऐसा भी नहीं है।    

मेरे महान देश के हर कोने में ऐसे ही तो महापुरुष भरे हुए हैं! सब अपनी-अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे होते हैं बस, समाज-सेवा करने के लिए। सच यह है कि जब खुद हमें भी मौका मिलेगा तो हम भी बता देंगे पूरी दुनिया को, कि ज़रूरतमंद का फायदा उठाना हमें भी आता है। संवेदनशून्यता के इस काले युग में हम सब अपने-अपने हिस्से की स्याही जीवन-कुण्ड में अर्पण कर अपने जीवन को धन्य कर रहे हैं। 

अगर अपनी जान पर खेलकर दूसरों को बचाने के लिए सेना के जवान 'भी' न आते, तो न जाने कितनी आँखें बहते-बहते दर्द के दरिया में डूब जाती, और कितनी आँखें अपनों की बाट तकते-तकते सूख जाती! पर ये फ़िज़ूल बातें सोचने का समय तो हमारे पास नहीं है। क्योंकि हम तो यहाँ सुरक्षित हैं। तो, हम तो घर बैठ कर पिज़्ज़ा खायेंगे, और सन्डे मनाएंगे। हम मुस्कुराएंगे। :)

जय जवान

Sunday, 17 March 2013

मेरी किताबी दुनिया

आजकल मेरे आस-पास क़िताबों के ढेर लगे रहते हैं। अंग्रेजी-हिंदी के उपन्यास पढने का नशा-सा हो गया है. हालांकि मैं इस समय व्यस्तताओं की चहारदीवारी में कैद हूँ और बहुत-से जरूरी कार्यों को भी ताक पर लगा रखा है, लेकिन फिर भी ये किताबें मुझसे नजदीकी का रस्ता ढूंढ ही लेती हैं।
कैसा अनोखा संसार रचा होता है इन किताबों-कहानियों में! पहले-दूसरे पन्ने पढ़ते हुए बहुत-से अजनबी पात्रों से मुलाकात होती है. उनके नाम और चरित्र याद करने और समझ पाने की कोशिश करते-करते पुस्तक के आधे पन्ने पढ़ लिए होते हैं। और अब तक न सिर्फ उन पात्रों से अच्छी-खासी दोस्ती हो चुकी होती है, उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए मन में झंझावत-सा भी छिड़ने लगता है. कई बार कहानीकार इतना प्रवीण होता है की हर एक पात्र को जीवंत कर देता है. किसी-किसी पात्र में तो खुद का ही अक्स झलकता दीखता है. पात्रों की भावनाओं के साथ मन इतना एकाकार हो उठता है की कहीं-कहीं तो नायक-नायिकाओं को तकलीफ में देखकर मेरी ही आँखों से पानी टपकने लगता है. अचानक आये किसी उतार-चढाव के साथ मेरी धड़कनें भी उछल-कूद करने लगती हैं. हमारा मन होता ही ऐसा है न! संवेदनाओं, प्रेरणाओं से भरा हुआ! और ख़ुशी, सम्पूर्णता की चाह रखने वाला! इन्ही कोमल संवेदनाओं की नींव बनाते हुए ही तो उपन्यासकार आखिरी पन्ने तक पहुँचते-पहुँचते सब गुत्थियाँ सुलझा देता है. वैसे किसी-किसी पुस्तक में ऐसा नही भी होता। वहां नायक के साथ आम आदमी की भावनाओं को जोड़कर कुछ अनुत्तरित सवाल छोड़ दिए जाते हैं, यह सोचकर शायद, कि इससे किसी की सोयी हुई चेतना पुनर्जागृत हो जाए!
तो ये कहानीकार भी खुद की एक दुनिया रच रहे होते हैं. उस दुनिया में उन्ही की मर्जी का संसार दिखता है. वो चाहें तो सुन्दर, और वो चाहें तो गन्दला! अपनी दुनिया के भगवान ही तो होते हैं, बस वो दुनिया होती कल्पना की है! कुछ चतुर कहानीकार हम पाठकों की दुखती रग की खूब पहचान कर लेते हैं. अंतिम पन्ने पर नायक को अकेला खड़ा कर दिया जाता है. उदास नायक के दर्द में हम परेशां हो उठते हैं, और बस, उपन्यास के सफल होने का रस्ता तैयार हो जाता है. लेकिन नही, ढेरों कल्पनाओं, भावों, विचारों और शब्दों को एक लय में लिख पाना कोई ऐसा आसान काम भी नही होता! गहरी मेहनत, जज़्बात और दूरदर्शिता का खेल होता है ये!  और अगर इस मेहनत के साथ कोई संदेश, कोई सामजिक सरोकार भी पिरो दिया गया हो तो क्यों नही झिंझोड़ देगा वो किसी के मन को! जो भी हो, मनोरंजन की दृष्टि से तो उपन्यासों को पूरे अंक मिलने चाहिए। दौ रही आज की जिंदगी में खुद के साथ चैन से समय बिताने का सचमुच बहुत ही सुन्दर जरिया होते हैं ये उपन्यास-किताबें! इन्हें पढना तो मुझे अच्छा लगता ही है, इन पर बतियाना भी अच्छा लग रहा है. 

Friday, 8 February 2013

शब्दों की कहानियां

कैसे मिलते हैं शब्द, और कैसे बनती हैं कहानियां! कभी तो कितनी आसानी से शब्द भी मिल जाते हैं और कहानियां भी बन जाती हैं, तो कभी-कभी खुद से बात-भर करने को ही ये मन चाह रखता है। शब्द अगर कलम से निकलने वाला भर ही हुआ करता तो शायद दिन-दिन में ही उपन्यास लिखे गए होते! पर जो मन से न फूटा, वो कैसा लेखन भला! मखमली महीन धागों से गुंथे हुए शब्द जब सीधे मन से स्फुरित होते हैं तो ही वो किसी भी मन को छू पाते हैं।  
वसंत आते ही मन बदलने लगता है। जब ऐसा ही खुशगवार मौसम हो जाता है तो कलम का जमा रक्त पिघल उठता है। फिर पन्ने रंगने में कुछ ज़्यादा मेहनत नहीं लगती। खुशबू का सिंगार किये हुई रेशमी हवाएँ अंगडाइयाँ लेती-लेती इठलाकर आँगन में आती हैं तो ये मन बावरा-सा होकर झूमने लगता है। हवाओं से रेशम के तन्तुओं को इकट्ठा कर-कर के उनसे शब्द बुनता है। और फिर उन शब्दों के पुष्प यहाँ-वहाँ बिखेर कर बहकने लगता है।
कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि मन अपनी इस मस्ती में इतना मग्न हुआ डोलता रहता है कि वह शब्दों की अपनी दुनिया में आना ही नही चाहता। गुनगुनाता रहता है और किसी के रचित गीत, झूमता रहता है अपनी ही लय पर स्वरचित अनोखी मुद्राओं संग! हवा से खुशबू के धागों को खींच-खींच कर नट की तरह उन पर झूलता रहता है। कभी धूप में सूरज की किरणों का ही विमान बना कर मुक्ताकाश में उड़ान भरता रहता है। तब, भाव तो बह-बह कर उतर आना चाहते हैं, शब्दित होकर अमर हो जाना चाहते हैं। लेकिन इस पगले ने जो ठान रखी होती है बस इन्ही पलों में जीने की, शब्दों की अनदेखी करने की, तो कौन ही मना पाए इसे! ऐसा ये मतवाला मन आखिर क्या चाहता है, किस रसभरी प्याली को पकड़ कर बैठा है, बस ये ही जाने।
और कभी जाकर जब इसका खुमार उतरता है, तो शब्दों के समंदर में गोते लगा-लगाकर मोती बटोरने में जुटा रहता है। उन मोतियों को भावों के सांचे में भर शब्दों की ऐसी आकृति भी कभी-कभार गढ़ बैठता है जो इसने खुद भी न सोच रखी थी। कितनी बार तो अपनी ही शब्दमाला पर ये मन ऐसे मोहित-सा हुआ रहता है, कि स्मरण कर-कर सर झुका देता है। भली तरह समझता है ये, कि इन कहानियों में मेरा कुछ किया-कराया नहीं, यह तो 'स्वयं' प्रसन्नता ही है, जो कि शब्दों से अभिव्यक्त होना चाह रही है।

Sunday, 30 December 2012

विश्वगुरु भारतवर्ष की जय।

भारत का एक आम आदमी भ्रष्टाचार से उतना ही दूर होता है जितना दूर उससे भ्रष्टाचार करने का 'मौका' होता है। हम लोगों की तो ऐसी ही कहानी होती है, कि जिस दिन रोटी मिल गयी तो वाह-वाह, और जिस दिन न मिली तो खुद को 'महान व्रतधारी' घोषित कर दिया। पता है मुझे, कि बहुत से अपवाद हैं यहाँ, पर देखने की बात है, मौका आते ही उनका भी क्या होगा -----
 मुझसे पूछा जाए कि भारत की दुर्दशा क्यों हो रही है, तो मेरा जवाब तो यही होगा, कि सरकार बाद में, आम आदमी पहले दोषी है। जैसा कि सुना करते हैं, आततायी के अत्याचार से समाज को उतना नहीं भोगना पड़ता, जितना सहन करने वाले की चुप्पी से। जो कभी एकजुट नहीं हो सकते, और कभी भी खुद के छोटे-से फायदे के लिए दुसरे को बड़ी-से-बड़ी मुसीबत में डाल सकते हैं, वो शासन से ईमानदारी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
विश्वगुरु भारतवर्ष की जय।

Wednesday, 15 August 2012

स्वतन्त्रता दिवस पर...

15 अगस्त, भारत का स्वतन्त्रता दिवस, यह वो दिन है जब हमारी मातृभूमि सही अर्थों में 'हमारी' मातृभूमि हो पायी थी। निश्चित रूप से यह एक अद्वितीय अवसर है अपने मित्रों को बधाइयां-शुभकामनाएं देने का, खुशियाँ मनाने का, और एक राष्ट्रीय छुट्टी का मज़ा लेने का। स्वतन्त्रता का वह संग्राम कैसे लड़ा गया होगा, ऐसी सब बेकार की बातों से तो सर्वथा दूर रहने का समय है यह। आखिरकार, ये देशभक्ति जैसी बातें भला किसके काम की हैं?
देखा जाए तो यह तो एक उत्सव के जैसा दिन है। और हम भारतीय तो इतने उत्सवप्रिय-उल्लासी हुआ करते हैं, हमने हमेशा 'पलों' को जीने में विश्वास किया है। ऐसे में, इस महंगे पल को व्यर्थ करने का तो कोई कारण ही नहीं होना चाहिए। राष्ट्र की अस्मिता की परवाह और देशभक्ति जैसे फ़िज़ूल की बातें तो उन बेचारे पगले सैनिकों के लिए ही छोड़ दी जानी चाहिए, जो अपना घर-परिवार, घरेलु उत्तरदायित्व न जाने किस कर्तव्य की चाह में होम कर दिया करते हैं!
खैर अब और समय व्यर्थ न करते हुए और इस दिवस के उल्लास को कम न करते हुए मुझे बिना वक्त लिए कह देना चाहिए, कि  मेरे भारतवासियों,
आप सभी को स्वतन्त्रता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
:- टिम्सी  मेहता   

[विनम्र कटाक्ष]


ये है मेरा असली भारत, जहाँ स्वतंत्रता के वास्तविक मायने स्पष्ट दीख रहे हैं....
                                             

Sunday, 12 August 2012

स्मृतियों के आँगन से ..

बारिश की बूंदों में भी अनोखा-सा कुछ असर होता है. चंद बूंदों की ज़मीन पर ही बचपन के नज़ारे तैरते नज़र आने लगते हैं...  मेरे परनाना जी, जिन्हें हम बाबाजी कहते थे, लकड़ी की एक छड़ी लेकर चला करते थे. चार-पाँच बरस की उम्र में मुझे उस छड़ी, और हॉकी-स्टिक का फर्क समझ में नही आता था. स्कूल में हमें तस्वीरें देखकर खेल का नाम बताना होता था, और इसलिए मम्मी घर पर तैयारी कराया करती थी. बाकी सब खेलों के नाम तो मुझे ठीक-ठीक याद होते ही थे, पर हॉकी की तस्वीर देखकर हर बार मेरा एक ही जवाब होता था, 'बाबाजी का डंडा'. :D बड़ों को ये सुनकर हँसी आती थी, और मुझे कौतूहल होता था, कि सही ही तो कहा है मैंने, तो इसमें हंसने की क्या बात हुई! आज तक भी हॉकी को हमारे घर में 'बाबाजी का डंडा' ही कहा जाता है
कल शाम की बारिश के बाद से ही यह प्रिय स्मृति बार-बार याद आ रही है. 

Wednesday, 11 July 2012

'जीवन-नाट्य मंचन'

विजेता बन, उस
गहन सत्ता को
कर परास्त,
प्रकट हुआ
प्रकाश घट.

अमृत मंथन
सम्पन्न हुआ
चीर कर
चिर अधीश
श्यामपट.

बिन्दुभर, और 
समग्र सिन्धु
लें हिलोरे,
झंकृत हुआ
व्यापक तट.


जीवन-नाट्य का 
अध्याय नव लिखते
सज्जित-प्रकाशित
मंच पर
इतस्तत: झूमते नट.

:-  टिम्सी मेहता  29.09.2006

Sunday, 6 May 2012

समाचार-पत्रों में प्रकाशित लेख

समाचार-पत्रों में प्रकाशित लेख (मई माह...)

Wednesday, 25 April 2012

लड्डू, बातें, और विचार...

लड्डू एक ऐसी मिठाई है, जिसे अपने स्वाद के लिए कम, और किसी शुभ शगुन के लिए ज्यादा चाहा जाता है. हम खाने-पीने के शौक़ीन भारतीयों के लिए हर एक  छोटी-बड़ी ख़ुशी लड्डू बांटने के साथ ही मुकम्मल हुआ करती है. मेरे सामने रखा हुआ लड्डुओं का डिब्बा मेरे इन विचारों का कारण है. एक पुरानी सखी कुछ ही देर पहले ये डिब्बा लेकर आई थी.
अपने पिता की पदोन्नति की ख़ुशी में सब परिचितों को लड्डू बांटते हुए मुझे भी एक डिब्बा देना वह नहीं भूली. बेशक, लड्डुओं के डिब्बे से ज्यादा मिठास तो उसे लाने वाली भावना की ही होती है, जो उन्हें और भी ख़ास बना देती है. एक लम्बे समय के बाद मिलते हुए हम दोनों ही बहुत उत्साहित थे. बहुत-सी ऐसी बातें की, जो थी तो पुरानी, पर इतने समय के बाद ताज़ा होने पर बिलकुल नयी होने का ही अहसास करा रही थी. कभी-कभी ऐसा लगता है, कि भले ही पूरी दुनिया हमारे साथियों से क्यों न भरी हुई हो, पर जो बात बचपन के मित्रों में होती है, वह किसी और में नहीं हो सकती. ऐसा लगता ही नहीं है, कि वे कहीं बाहर से आये हैं. बिलकुल अपने परिवार के ही एक सदस्य के जैसे लगते हैं बचपन के दोस्त. और ऐसे में, कितना समय बातें, बातें, और बातें करने में निकला, पता ही नहीं चला. लड्डू खाते-खाते मैंने उसके पिताजी के विभाग के विषय में स्वाभाविक प्रश्न किया. उसने बताया, कि पिताजी बहुत खुश हैं, क्योंकि पदोन्नति के बाद अब उनके कक्ष में एसी, फ्रिज, एवं सोफा भी मिलेगा. बहुत समय से उन्हें यही इंतज़ार था, कि पदोन्नति जल्द हो, ताकि सभी सुविधाएं प्राप्त हो सकें. इसके बाद भी हमारी चटपटी बातों की गाड़ी तो युं ही दौड़ती रही, पर मेरे दिमाग में कुछ विचार बराबर-समानांतर चलते रहे. पदोन्नति कौन नहीं चाहेगा! पदोन्नति होगी, तो ही सुविधाएं होंगी. ज्यादा सुविधाएं, यानि कि बेहतर जीवन-शैली, समाज में ऊँचा कद, प्रतिष्ठा! क्या इसके अलावा पदोन्नति के साथ ही यह भी याद नहीं रहना चाहिए, कि अब अपने विभाग के प्रति उत्तरदायित्व भी बढ़ गया है? वर्षों के अर्जित अनुभव को बेहतर रीति से प्रयोग करने के लिए होने वाली पदोन्नति जिस कुर्सी पर बिठाती है, उसपर बैठने के बाद होना तो यह चाहिए, कि कुर्सी की गरिमा-मर्यादा बनी रहे. पर होता समाज में क्या है, वह कोई छिपी हुई बात तो है नहीं. कभी न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी चढ़ाई गयी थी इस विचार के साथ, कि पक्षपात की सम्भावना न रहे. पर आज उस मूर्ति, और गाँधारी का फर्क समझ में नहीं आता. 'कर्तव्य और अधिकार' का भेद समझने में हम पढ़े-लिखे लोग ही सबसे ज्यादा गच्चा खा गए हैं. कर्तव्य-पालन में फिसड्डी हो चले, और अधिकार-क्षेत्र में दबदबा है.
वैसे तो मीठे-मीठे लड्डू खाते हुए, और मसालेदार बातें करते हुए, ऐसे विचारों की कुछ ख़ास गुंजाइश नहीं होनी चाहिए. पर ये मानव-मन, हवा की परवाह ही कब करता है दिशा चुनना के लिए! हम पुरानी सखियों की बातें भी नहीं थमती, और मेरे विचार भी युं ही बहते रहते हैं.

Wednesday, 18 April 2012

मुझे मत मारो..

पता नहीं हमारे समाज में बच्चियों को दुर्गा का स्वरूप क्यों कहा जाता है! उन्हें पूज्या, कंजिका और साक्षात शक्ति भी कहते हैं, और अपने ही घर में जन्मी उसी देवी को मार-मार कर उसके प्राण भी ले लिए जा रहे हैं. उसका कसूर सिर्फ इतना, कि वह लड़का ‘नहीं’ है. अगर वह लड़का होती, तो ऋण लेकर भी उसके जन्म पर जश्न मनाया जाता. लेकिन अगर वह लड़की है, तो उसे क्या अधिकार है जीने का!
इन दिनों में लगातार ऐसे दारुण समाचारों ने शायद ही किसी का ध्यान न खींचा हो. खबर पढ़ते भर ही आँखों में आँसू भर आते हैं. भला एक जन्मदाता इतना क्रूर-कठोर कैसे हो सकता है, कि फूल जैसी कोमल अपनी ही बच्ची पर आघात करे! इतने दुष्ट, और निर्मम तो पशु भी नहीं हुआ करते, क़ि अपनी आश्रित संतान के साथ ऐसा व्यवहार करें. वे नादान बच्चियाँ, जिन्होंने अभी आँखें खोली भर ही थी, को क्या पता होगा, क़ि यह दुनिया आखिर क्या है! हर एक वार के साथ वो कितना बिलखी होंगी, तड़पी होंगी, केवल उन्हें ही पता होगा. वे तो इतना भी बोलना नहीं जानती थी, कि “मुझे मत मारो”! और अगर बोलना जानती भी होती, तो भला किसे बुलाती अपने माता-पिता से खुद को बचाने के लिए? नन्हे बच्चों को कोई बाहर वाला प्यार से ज़रा पुचकार भी देता है, तो माता-पिता तुरंत काला टीका लगा दिया करते हैं, कि कहीं उनके लाडले को बुरी नज़र न लग जाए. कहीं थोड़ी सी चोट लग जाए, तो माता अपनी गोद में उसे सम्हाल कर थपकती है, सहलाती है. जब तक वह अपना दर्द भूल न जाए, तब तक उसे हौले-हौले दबाती रहती है. पिता एक पहरेदार के समान खड़े रहते हैं, कि कहीं दोबारा उसकी आँखों में आँसू न आ जाएँ. पर यह कैसी विडंबना, कि स्वयं रक्षा करने वाले ही कंस की तरह निष्ठुर हो गए! केवल ‘पुत्र’-सन्तान की चाह में किये गए ऐसे पापपूर्ण व्यवहार को समझ पाने में मानवता तो लज्जित ही होती होगी. मुझे तो पूरा संदेह है, कि ऐसे माता-पिता अपने पुत्र को भी प्रेम दे पायें. जिनके मन में अपनी ही एक दुधमुंही बच्ची के लिए स्वीकृति न बन पायी, उनके मन में कभी किसी के लिए स्नेह नहीं हो सकता. और न ही वो खुद किसी के भी स्नेह के अधिकारी हो सकते हैं. स्नेह-तिरस्कार तो बहुत दूर ही बात है, वो तो अपने आप में एक कलंक ही हैं माता-पिता के नाम पर!
क्या सिर्फ दो समय की रोटी नहीं दे सकते थे वो उस निरपराध बच्ची को! पुत्री का होना कितने बड़े सुख की बात है, यह तो कोई उनसे पूछ कर देखे, जिन्हें ईश्वर की ओर से सन्तान का उपहार नहीं मिल पाया. तरसता होगा मन, कि उनके भी आँगन में अपने नन्हे-नन्हे हाथ-पैर हिलाते हुए एक कन्या की किलकारियाँ गूँजें! उसकी पायल की ध्वनि से घर का कोना-कोना मुस्कुरा उठे! नन्ही पुत्री के एक स्नेहिल स्पर्श को तरसते हैं शुष्क मन. लेकिन पाषाण-हृदय क्या समझ पायेंगे इन भावों को! मन में एक विचार आ रहा है. काया से नादान उस बच्ची की आत्मा पर कितना अमिट दंश लगा होगा अपने ही पिता द्वारा पीट-पीट कर मार दिए जाने पर! शायद वह पशु होना स्वीकार कर लेगी अगले जन्म में, लेकिन बालिका होना तो कतई न चाहेगी.
हम यहाँ पढ़-सुनकर चार दर्द-भरी बातें बोलकर अपने-अपने जीवन में फिर से व्यस्त हो जायेंगे. पर कुछ प्रश्न अनुत्तरित छूट जायेंगे. क्यों हमारे समाज के कुछ हिस्से इतने संवेदनशून्य हो चुके हैं, कि उनके कृत्यों पर अनजाने भी फूट-फूट कर रो देते हैं, पर स्वयं उन्हें कोई मलाल ही नहीं होता? क्यों नहीं हमारा समाज अस्वस्थ हो रहे इन तत्त्वों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए कोई प्रयास करता? क्यों नहीं हम समझ पाते, कि समाज का अर्थ है, ‘मैं, और आप’? क्यों नहीं, मैं, और आप अपने-अपने मोर्चे पर खड़े होकर नन्हें ही सही, प्रयास तो करते, इन अमानवीय कृत्यों को मिटाने का? एक अंतिम प्रश्न ईश्वर से है. हे ईश्वर, क्यों नहीं आप कन्याओं का भाग्य किसी बेहतर रंग की स्याही से लिखते?

Friday, 13 April 2012

समाचार-पत्रों में प्रकाशित लेख.

समाचार-पत्रों में प्रकाशित लेख (अप्रैल माह)