Monday, 31 March 2014

सुच्चा मोती बना ...

टूटा था तारा कहीं,
छूट के गिरा जो
आसमां के दामन से। 

देख उसे मन में
एक ख़ाब संजो लिया
आस के जोबन से।   

सुच्चा मोती बना
मन में था संभाला
बड़े जतन से। 
 
टूटा जो मोती आज,
बह के आ निकला वो 
आँखों के आँगन से...

ज्य़ादा तड़पाते हैं
ये टूटे मोती, देखो…
काँटों की चुभन से। 

:- टिम्सी मेहता

1 comment:

Dhruv Singh said...

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १५ जनवरी २०१८ को लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/