Tuesday, 3 January 2012

मम्मी, सोने दो न!


सर्दियों में सुबह की मीठी नींद बहुत प्यारी लगती है. मीठी नींद से भी ज्यादा मीठे सपने तोड़कर सुबह उठने का बिलकुल मन नहीं होता. रात को मीठी लोरी, या फिर सुन्दर कहानियाँ सुनाकर जो माँ अपने बच्चों को गाढ़ी नींद में सुलाती है, सुबह वही माँ अपने नादान नौनिहालों की नींद तोड़ भी देती है. मन तो शायद उसका भी करता होगा, कि प्यारे बच्चे कुछ देर और भी यूँ ही सोते रहें, सपनों के संसार में परियों से मुलाकातें करते रहें! पर फिर भी कुछ बातें उसे मजबूर कर ही देती हैं उन्हें सपनो की दुनिया से बाहर लाने के लिए. 
जहां एक ओर अनुशासन का पाठ पढ़ाना ज़रूरी होता है, वहीँ दूसरी ओर उनके भविष्य का विचार करते हुए उनकी पढ़ाई-लिखाई के लिए भी तो सही समय पर विद्यालय भेजना होता है. ऐसे में, हौले-हौले थपकी देकर बच्चों को निद्रा के प्रदेश से बाहर लाना माँ को बेहतर लगता है. बच्चों के जगने से लेकर, उनके तैयार होने तक, और उसके बाद नाश्ता-कलेवा कर लेने तक उनके बचकाने नखरे सहन करना माँओं  को बहुत अच्छा लगता है. कभी-कभी स्नेहमयी होकर वो उन नखरों को पूरा भी कर देती है, और अपने लाडले बच्चों की एक मुस्कान की उड़न-तश्तरी पर सवार होकर स्वर्ग की सैर कर लेती है. तो कभी-कभी कठोरता की ओढ़नी ओढ़कर मीठी डांट भी लगा देती है. जो भी करती हो, उसकी आँखों में एक सपना बराबर पलता रहता है, कि बच्चा बड़ा होकर बहुत योग्य बनेगा, सुखी रहेगा. और इन्ही सपनो में जीते हुए, हर दिन वो अपने हृदय के अंश को पढने के लिए भेज दिया करती है. पर वो समझ नहीं पाती है, कि उसकी ममता का भाव उसकी ही दृष्टि के आड़े आ रहा है. न वो कभी धूप की परवाह करती है, और न धुँध की. वो भूल ही जाती है, कि जिस स्कूल में वो बच्चे को पढ़ाने के लिए भेज रही है, वो तो केवल एक व्यावसायिक संस्था-भर है, जिसके लिए नियम-कायदों का पालन बस 'होना' चाहिए. पगली माँ आज भी स्कूल को शिक्षा का मंदिर समझती रह जाती है. और ख़ुशी-ख़ुशी नोटों का चढ़ावा चढ़ती रह जाती है. स्कूल वाले भी, एक यांत्रिक शिक्षा-पद्धति के साथ, बस हर दिन किताबों का पाठ पढ़ा दिया करते हैं. सुबह भले धुँध में हाथ को हाथ न सूझता हो, पर बच्चों की उपस्थिति तो अनिवार्य है. दोपहर की धूप में भले ही कौवा भी छिप जाता हो, पर बच्चों के लिए कोई छूट नहीं. पता नहीं, किस आकाशीय परियोजना के अंतर्गत बच्चों को भी यंत्र बनाने की ये प्रक्रिया चलती रहती है! 
अभिभावक ममता-परवश होकर समझ नहीं पाते, और विद्यालय अनुशासन की आड़ ले लेता है. लेकिन क्या मानवाधिकार के अंतर्गत, बच्चों के लिए ये सही है? कितने बच्चों के तो प्राण भी लील गया है ये धुँध के दिनों का कठोर अनुशासन! तो क्या बच्चों की प्राथमिक शिक्षा उनके जीवन से भी अधिक महँगी हो चुकी है, जो सर्दी की चरम अवस्था के इस मास में भी उनके लिए अवकाश की व्यवस्था नहीं है? 'मम्मी, सोने दो न!' कहते बच्चों को जगाकर माँएँ पता नहीं क्यों, 'जीवन' से संघर्ष के लिए स्कूल भेज देती हैं! एक यांत्रिक युग का इससे बड़ा उदहारण शायद और कोई नहीं हो सकता.

2 comments:

Rajesh Kumari said...

vicharniye post.very nice.

Timsy Mehta said...

वैचारिक स्वीकृति हेतु आपका आभार..!