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Wednesday, 19 October 2011

रिअल्टी शोज़ बनाम रिअल लाइफ

ब्लैक एंड व्हाईट से रंगीन तक का सफ़र तय करने में टेलीविज़न ने बहुत लम्बा समय लगाया. लेकिन एक बार रंगीन होने के बाद, अब हर रोज़ इसके रंग बदल रहे हैं. और इसका असर कितना गहरा है, उसके साक्षी तो हम सब खुद ही हैं. टेलिविज़न पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम एक साधारण दर्शक के सामाजिक दृष्टिकोण को प्रभावित करने में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं. आज से कुछ ही समय पहले तक, 'सास-बहु के सीरिअल' ही ये तय करते थे, कि भारतीय नारियाँ अगले दिन होने वाली भारी-भरकम खरीददारी किस चीज़ की करेंगी. आस-पड़ोस की गप्पों, और चुगलियों की जगह इन सास-बहु के किरदारों ने बखूबी ले ली थी. मानो, एक भावनात्मक-सा रिश्ता स्थापित हो चुका था, भारतीय नारियों, और इन सीरिअल किरदारों के बीच. 
पर आज के टेलीविज़न का परिदृश्य कुछ बदला सा है. लम्बे समय से 'ऊबाऊ' का तमगा झेल रहे इन सास-बहु सीरियालों की जगह आज रिअल्टी शोज़ का झंडा फहरा रहा है. सब नामी मनोरंजन चैनल एक या अधिक तरह के रिअल्टी शोज़ प्रसारित करने में लगे हुए हैं. एक होड़ का भी नाम दिया जा सकता है, और प्रतिस्पर्धा का भी. और इस होड़ में, जो सबसे अलग होगा, वही टिक पायेगा. कुछ इस मानसिकता के साथ, चैनल वाले अपने शो के विषय का चयन करते हैं.
ये रिअल्टी शोज़ आम आदमी से लेकर सेलिब्रिटीज़ तक की सहभागिता के ज़रिये कार्यक्रम को असल जीवन से जोड़ने का प्रयास करते हैं. और दर्शक, इनमे दिखाए जाने वाले भावों के उतार-चढ़ाव में खुद को खोजता है. गायन, नृत्य, विविध प्रकार की प्रतिभाओं के प्रदर्शन से लेकर, खतरनाक स्टंट करना शुमार होता है इन शोज़ में. कभी आम आदमी की प्रतिभा की खोज की जाती है, तो कभी नामचीन लोगों को परीक्षा के घेरे में लाया जाता है. और इसके बदले में विजेता को मिलती है, एक बड़ी धनराशि, और बेशुमार शोहरत. और ये इनाम रातोंरात ही विजेता को एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा देता है, जिसकी चाहत हज़ारों को होती है. 
इस दृष्टि से देखा जाए, तो ये रिअल्टी शोज़ किसी शॉर्ट-कट से कम नहीं हैं सफलता के लिए. पैसा, नाम, और पहचान के साथ-साथ अपने मनपसंद करियर की ओर रास्ता खुल जाता है. लेकिन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो इन रिअल्टी शोज़ की परिकल्पना कुछ सही नहीं लगती. इन चैनलों के लिए तो केवल टीआरपी जुटाना ही एकमेव मकसद होता है. और उसके लिए ये लोग शो में किसी भी तरीके से आकर्षण बढ़ाना चाहते हैं. ऊल-जलूल तरीकों से भी आकर्षण बढाने से उन्हें कोई परहेज़ नहीं होता. इनामी राशि को ऊंचा करने के पीछे भी यही सोच होती है. और उस राशि को हासिल करते ही किसी की भी ज़िन्दगी रातोंरात फर्श से अर्श का सफ़र तय कर सकती है. इसीलिए भाग लेने वालों की महत्वाकाँक्षा भी आसमान छूने लगती है. लेकिन हज़ारों में से कुछ बीस-पच्चीस को ही स्वीकार किया जाता है, और बाकी सब को बाहर का दरवाज़ा दिखा दिया जाता है. और इतना ही नहीं, इसके बाद उनकी भी यूँ छंटनी की जाती है, कि सिर्फ एक को ही विजेता घोषित किया, और बाकी सब खाली हाथ घर लौटने पर मजबूर. सवाल तो उठता है, कि क्या उन बाहर कर दिए गए हज़ारों में प्रतिभा का ऐसा अभाव सचमुच रहा होगा? हाथ कंगन को आरसी क्या, हम सब ही गवाह रहे हैं किसी न किसी ऐसे शो के, जहां योग्य प्रतिभागी को भी अस्वीकार किया गया. बहुतेरी बार चयन-प्रणाली पर भी सवाल उठे हैं, और पारदर्शिता पर भी. पर जो भी हो, इन नतीजों के साथ ही, टूट जाते हैं वो हज़ारों सपने भी , जो सिर्फ चंद लोगों के द्वारा एक रणनीति के तहत बुने गए होते हैं. 
अगर इतना कुछ ही होता, तो भी शायद गवारा हो जाता. पर जब छोटे-छोटे बच्चों के लिए भी ऐसे शोज़ की प्रस्तुति की जाती है, तो आश्चर्य होता है. महज़ छः से बारह-तेरह वर्ष तक के छोटे बच्चों को प्रतिभागी बनाकर गायन-नृत्य जैसी प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं. छोटे-छोटे बच्चों में जीतने को लेकर जिस प्रकार की ललक  दिखती है, वो सचमुच चिंता का विषय है. क्योंकि यह तो पूर्व-निर्धारित ही है, कि सिर्फ एक बच्चा विजेता होगा. हर एक सप्ताह जब एक प्रतिभाशाली बच्चे को शो से बाहर किया जाता है, तो उसकी प्रतिक्रिया बेहद दुखास्पद होती है. फूट-फूट कर रोते इन बच्चों को चुप करा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. और तिस पर 'वाइल्ड-कार्ड' नामक जुमला, वो तो इन बच्चों को बाहर निकलने के बाद भी एक उम्मीद में रखता है, फिर शो में वापसी की. अब वाइल्ड-कार्ड एक, और बच्चे अनेक. तो इस तरह एक बार फिर, किसी एक के चयन के बाद, बाकी के नन्हे बच्चों के सपने उसी वेग से टूट जाते हैं. अब यदि बाल-मनोविज्ञान समझा जाए, तो कई प्रश्न हैं. जैसे, क्या इतने छोटे बच्चे इतना बड़ा दवाब झेल भी सकते हैं, जो उन्हें ऐसे शोज़ में मिलता है? अगर वो विजेता बन भी जाएँ, तो क्या जीतने के बाद मिलने वाली प्रतिष्ठा को वो संभाल पायेंगे? इतनी बड़ी सफलता मिलने के बाद क्या उनके बचपन की सुन्दरता महफूज़ रह पाएगी? और जीत न पाने की स्थिति में, क्या इतनी बड़ी विफलता उन्हें आसानी से सामान्य होने देगी? दोनों ही हालात में, उनका मन इतना मज़बूत नहीं होता, कि आने वाली परिस्थितियों में वे सामान्य व्यवहार रख पायें. पर इस बड़ी चिंता से कोसों दूर, अभिभावक उन्हें ऐसे बड़े मंचों पर ले जाना एक गौरव का विषय समझते हैं. अपने अधूरे सपने पूरे करना, या फिर जल्द अमीर बने की चाहत, या फिर शायद समाज में प्रतिष्ठित होने के लिए, उन्हें ये रास्ता बहुत आसान लगता है. पर सच यह है, कि ऐसा करके वो अपने बच्चों के बचपन को ही छीन रहे होते हैं. गुलाब की नाज़ुक कली समय आने पर ही सुन्दर फूल बन पाती है. समय से पहले उससे छेड़-छाड़ करना उसके एक सुन्दर पुष्प में परिणत होने की संभावनाएँ कम करने के जैसा है. और ठीक उसी तरह, बचपन की नजाकत से भी छेड़-छाड़ करना कोई हितावह नहीं है. 
समस्या ये है, कि पूरा समाज ही आज ऐसी चीज़ों के अन्धानुकरण में लगा हुआ है. जब तक समाज के सब लोग इस नवीन संस्कृति के मनोवैज्ञानिक पहलु से अवगत नहीं हो जाते, तब तक हालात परिवर्तित होने की संभावनाएँ बहुत ज्यादा नहीं हैं. लेकिन अपने जीवन के प्रति उत्तरदायी तो हम खुद ही हैं. और कोई समझ पाए या न, एक ज़िम्मेदार अभिभावक के लिए तो, जागरूक होकर अपनी संतान को बड़ा होने तक योग्य बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए, बनिस्बत बचपन में ही उसकी प्रतिभाओं को निचोड़कर बड़े होने तक उसे नीरस कर देने के.

Friday, 30 September 2011

अब भी समय है..


ये बदलता हुआ मौसम कितना अच्छा लगता है..! लम्बी गर्मियों का 'फिर मिलेंगे' कहकर विदा लेना, और सर्दी का दबे-पैर हवाओं में शामिल होना. लम्बे समय से गुपचुप-गुमसुम से दिखते गुलाब के पौधों पर भी रंगों की तरंगों की अठखेलियों का मौसम..! और इस सुहानी वेला के साथ-साथ पवित्रता का, शुभता का, नवरात्र का शुभ आगमन. शक्ति-उपासना का पावन समय. व्रत-उपासना का उपयुक्त अवसर, और कन्या-पूजन की तैयारियां ! 
ऐसे ही याद आ रहा है, कि बचपन में ऐसी बातें आम सुनाई देती थी, कि कन्याओं में तो साक्षात माँ दुर्गा का वास होता है. बच्चों के मुख से साक्षात भगवान् बोलते हैं. उस वक़्त सुनकर बहुत अच्छा भी लगता था, और थोड़ा-सा अजीब भी. अच्छा इसलिए, क्योंकि एक सम्मान की दृष्टि मिलती थी हम लोगों के प्रति, छोटा बच्चा होते हुए भी. वैसे भी, सम्मान प्राप्त करना तो सबको ही मीठा लगता है. और अजीब इसलिए लगता था, क्योंकि उस समय भी मन में सवालों के बादल मंडराते रहते थे. "कहाँ है मुझमे दुर्गा, मैं तो बस ये ही हूँ !  जैसे सभी बड़े हैं, वैसे ही तो हम बच्चे हैं..! अगर हममे भगवान् हैं, तो उनमें क्यों नहीं?" बहुत कुछ इसी तरह के तर्क आया करते थे मन में ऐसी बातें सुनकर.
पर हमेशा ही, ये जवाब सुनने के बाद बड़े मुस्कुरा दिया करते थे. और आज बड़े होने के बाद, याद कर के मुझे भी हँसी आती है अपनी वो बातें. लेकिन अब इन बातों के पीछे छिपा मर्म भी थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा है. उस समय ऐसी बात से लगता था, कि क्या कोई मोरपंख सिर पर लगा कर, या धनुष-बाण हाथ में धारण किये हुए भगवान् हैं, जो हम बच्चों के मन के भीतेर छिपे हुए हैं? कैसे रहते होंगे मन में छिपकर? वैसे बड़े ही बाल-सुलभ, और स्वाभाविक-से सवाल हैं ये..! 
पर आज इतना तो समझ आया ही है, कि भगवान् की परिभाषा ही दरअसल गलत गढ़ रखी थी हम लोगों ने. भगवान् किसी आकार-विशेष का नाम है क्या? क्या सिर्फ चमत्कार ही भगवत्ता का प्रमाण हैं? मेरी समझ में तो, 'बिलकुल नहीं'. भगवान्, यानि कि पवित्रता, सत्यता, स्वाभाविकता. जहां ये गुण हैं, वहीँ है भगवत्ता..! और बच्चों से तो दूर ही कहाँ होते हैं ये गुण! प्रकृति की पवित्रतम अवस्था जहां अभिव्यक्त होती है, उसी का तो नाम'शिशु' है. जैसे-जैसे हम बड़े होते चले जाते हैं, प्रकृति से विकृति की ओर यात्रा करते चले जाते हैं. बड़े होते-होते, पवित्रता को किसी प्राचीन युग का आभूषण समझ बैठते हैं, जो आज दृष्ट्प्राय ही नहीं है. सत्यता को इस नाम और दाम के युग में कोई नहीं जानता. और स्वाभाविकता, आज के बनावटी युग में क्या काम है उसका? और इसीलिए 'भगवत्ता' का अंश भी आयु बढ़ने से साथ-साथ क्रमिक रूप से घटता चला जाता है. तो इस नज़रिए से, हाँ, आज मुझे भी वो बात बिलकुल सच ही लगती है, कि बच्चों में भगवान् बोलते हैं. वैसे, मूर्ति वाले भगवान् ने तो न कभी जवाब दिया, न देंगे. पर इन नन्हे बच्चों के पास तो शब्दों के भण्डार रहते हैं. किसी की समस्या का हल भले ही उन शब्दों में न हो. पर इस बात से तो हम कभी इन्कार नहीं कर सकते, कि बच्चों की बातें सुनने भर से ही मन प्रसन्न हो जाता है. ये नन्हें बच्चे तो हर पल वाचाल होकर दुनिया को सुन्दर बनाते रहते हैं. 

अपनी चंचलता और सरलता के रंगों से, दुनिया नाम के इस व्यापक चलचित्र को एक सुखद अनुभव बनाने वाला ये बचपन यूँ चहकता, महकता-सा ही अच्छा लगता है. बचपन की बगिया से फूटने वाले प्रसन्नता के पुष्पों से ही तो जगत नामक इस वाटिका की शोभा हैं. बस इस बात का डर है, कि बड़ों की दुनिया की स्वार्थ-परायणता, कठोरता, और भयावहता देख कहीं ये बचपन डर कर संकुचित न हो जाए! दुनिया की कालिख कहीं इस निर्मल बचपन को भी गन्दला न कर दे! और कहीं ये सुनेहरा बचपन अपनी स्वाभाविक मुस्कान न खो दे...
कितना अच्छा हो, अगर इस बदलते मौसम के साथ हमारे मिज़ाज भी कुछ बदल जाएँ, और जिस उच्चता-पवित्रता को हम मूर्ति में ढूंढते रह जाते हैं, उसे अपने आस-पास ही टटोल सकें. भगवान् सचमुच दूर नहीं लगेंगे.
नवरात्र सबके लिए मंगलमय हों.

Thursday, 22 September 2011

वो बचपन की बातें..



कभी-कभी एक शब्द ही बहुत होता है बचपन की भूली-बिसरी यादों को ज़िन्दा करने के लिए.. अभी-अभी कहीं से सर्कस शब्द सुना, और एक पुराना झरोखा खुल गया, जिसमे झाँक कर देखना एक प्यारी मजबूरी बन गयी थी. पांच साल की उम्र थी मेरी, जब हमारे शहर में सर्कस लगी थी. हम भाई-बहन को स्कूल से सीधे सर्कस पहुंचाने की हिदायत रिक्शा-चालक को दे दी गयी थी, पर हम लोगों को इसके बारे में कुछ पता नहीं था. एक सरप्राइज़ था. जब रिक्शा सर्कस के आगे जा रुका, तो हम लोग बहुत हैरान हुए. "कहीं चालक किसी गलती से तो ऐसा नहीं कर रहा, या कहीं किसी और बच्चे को तो यहाँ नहीं उतारना",  जैसे कई ख़याल एक ही मिनट में हमारे दिमाग में आ गए. लेकिन इतने में ही हम दोनों ने अपनी माँ को हमारी ओर आते देखा. एक भरपूर मुस्कराहट से उनका स्वागत हुआ. मुस्कराहट इतनी ज़ोरदार थी, कि कह सकते हैं कि होंठ कानों को छूने लगे. उसके बाद तो एक-एक कदम जिस हैरानी, ख़ुशी और कौतुहल से अन्दर की ओर बढ़ा, उसका एहसास आज भी ज्यों का त्यों ताज़ा है. सुन रखा था, कि सर्कस में जानवर होते हैं, शेर, बन्दर, और पता नहीं कौन-कौन.. मन जैसे हवा में उड़ रहा था.. 
 हम अन्दर पहुँच कर कुर्सियों पर बैठ गए. और  कुछ ही देर में शो शुरू हुआ. जानवरों के करतब..जो कि हैरत-अंगेज़ होते ही हैं, शुरू हुए. वहाँ , पंडाल में बैठे हुए, शायद ही कोई ऐसा कोना हो, जिस ओर मैंने अपनी नज़र न घुमाई हो. मेरे स्कूल से और कौन-कौन से बच्चे आये हैं, और कौन-कौन लोग हैं, जिन्हें हम जानते हैं, ये सब जासूसी कर डाली. 
दो-तीन घंटे में शो ख़तम हो गया होगा. मेरे लिए, ये सब एक बिलकुल नया अनुभव था, और उस उम्र तक कहुं, तो तब तक का सबसे शानदार अनुभव. जैसे पंख लग गए हों, ऐसे उड़ते हुए हम घर पहुंचे. कितने दिन तक इसी उन्माद में हम झूमते रहे,  भले ही बहुत बचपन की बात है, पर मुझे आश्चर्यजनक रूप से बिलकुल ठीक-ठीक याद है. कुछ महीनों बाद, मैंने उस दिन की यादें अपनी माँ के साथ ताज़ा करनी चाही. मैंने उन्हें बताया, कि जितना अच्छा उन जानवरों को देखने में लग रहा था, उससे भी अच्छा शो तो सर्कस  की छत पर हो रहा था. मेरी माँ ने हैरान हो कर पूछा, कि छत पर कौन सा शो हो रहा था ? तब मैंने उन्हें याद दिलाने की कोशिश की, कि वहाँ कई लोग करतब दिखा रहे थे. साफ़ शब्दों में, माँ ने मुझे बताया, कि ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ था उस शो में, और सर्कस तो नीचे ही हो रही थी. 
तब मुझे समझ आया, कि जो कुछ मैंने देखा था, वो मेरी कल्पना की उड़ान थी. खुद ही, मैंने पता नहीं क्या-क्या ख्वाब बुन लिए थे वहाँ बैठे-बैठे..और उन का मज़ा भी खूब लिया. हालांकि बात तो कुछ अनोखी नहीं है, लेकिन जब वो कल्पनाशीलता याद आती है, तो मन में एक मुस्कान-सी आ जाती है. ऐसा ही कच्ची-मिटटी का-सा  होता है बाल-मन... माता-पिता पूरे जतन से उन्हें कहीं घुमाने ले जाते हैं, एक नया अनुभव दिलाने के लिए, लेकिन उन्हें, अपने सपनो से फुर्सत ही नहीं होती... !
यों निजी तौर पर आज की तारीख़ में मुझे सर्कस की अवधारणा भी कुछ अच्छी नहीं लगती. पशुओं के स्वाभाविक अधिकारों का हनन लगता है ये.   पर स्मृतियों के पन्ने पर अंकित वो चित्र कई बातें सोचने पर मजबूर कर देते हैं. आज के समय की सोचें, तो ऐसा लगता है कि  वो बचपन तो आज के दौर में शायद लुप्त-प्राय ही हो चुका है. आज के दौर में लुप्त-प्राय ही हो चुका है . आज के बचपन में न तो वैसी ललक-पुलक है, न वो आजादी.  न मिटटी में धूल-धूसरित होना, और न बारिश में मोर की तरह झूमना. काग़ज़ की कश्तियाँ तो शायद एक ऐतिहासिक पुर्जे के जैसी हो चुकी हैं. पर वोही तो कशिश थी बचपन में!   आज का बच्चा शायद अपने पिता से भी ज्यादा तकनालाजी की बात जानता हो, लेकिन भोलापन... वो क्या होता है, उसे नहीं पता..
और ये सोच कर लगता है, कि 'बचपन' नामक विकास का सोपान भी एक दिन संग्रहालय में ही जाना जा सकेगा.. क्योंकि तब शरीर से वो भले ही बच्चे हों, लेकिन दिमाग से, प्रौढ़ के जैसे होंगे. अच्छा हो, कि ऐसे किसी कडवे सच का सामना करने से पहले ही हम एक बेहतर कदम उठा लें..!


Thursday, 8 September 2011

बातें भूली-बिसरी सी. . .


कहते हैं, कि बीते हुए कल के बारे में सोचना समय की बर्बादी है. क्योंकि अब वो बदला नहीं जा सकता. और आने वाले कल के बारे में सोचना भी समय की बर्बादी है. क्योंकि वो तो अज्ञात ही है. हम जानते ही नहीं हैं, कि कल क्या होगा, कैसा होगा. इसलिए, वर्तमान में ही जीना चाहिए, वर्तमान को ही जीना चाहिए, भरपूर !
यों, मेरी भी यही सोच है. पर कभी-कभी, कोई ऐसी हवा चल ही पड़ती है, जिससे जीवन की किताब के वो पन्ने खुल जाते हैं, जिन्हें हम 'अतीत' कहते हैं. और ऐसे ही, अचानक, एक बचपन का वाकया याद आ गया.
सातवी कक्षा की बात है. ग्यारह साल उम्र थी मेरी. हमारी इंग्लिश की क्लास एक सर लिया करते थे. वो एक रजिस्टर उठा कर आया करते थे, और उसमे लिखे हुए उत्तर हम लोगों को लिखवाया करते थे. एक दिन, मेरी एक मित्र कहीं से एक गाइड ले आई, और उसने हमें उसमे लिखे प्रश्न-उत्तर दिखाए. हमारी आँखें फटी की फटी रह गयी. ज्यों-के-त्यों, वही जवाब ! हम सब बच्चे, जो अपने अध्यापक के प्रति बहुत सम्मान का भाव रखते थे, गुस्से से भर गए. और दबी आवाज़ में, एक खिलाफत करने लगे. कुछ दिनों तक तो ऐसे ही चला. और फिर, एक दिन हवा में उड़ता-उड़ता, किसी क्रांतिकारी का भूत हमारी क्लास में आ गया. पता नहीं, और कोई नहीं मिला उसे, मेरे ही सर पर सवार हो गया वो. फिर क्या था, मैंने पूरी क्लास के सामने, अपने अध्यापक से कह दिया, कि,  "सर, आप गाइड में से देखकर पढ़ाते हैं. " मुझे आज भी उनकी प्रतिक्रिया याद है. वो तो जैसे सुन्न-से ही हो गए. और हैरत से चिल्लाए कि, "क्या !! मैं गाइड से पढाता हूँ ?" मैंने भी निडर होकर कहा, कि, "हाँ, आपका पढ़ाया गया एक-एक शब्द गाइड से लिया गया है." कुछ क्षण वो चुप रहे. फिर उन्होंने बताया, कि जिस रजिस्टर में से देखकर वो लिखवाते हैं, वो उनका नहीं, एक अन्य अध्यापिका का है. और वो उनसे पूछ कर बताएँगे. उनकी इस बात पर मुझे संतुष्टि हो गयी. क्योंकि जिन अध्यापिका का नाम उन्होंने लिया था, उनके हाथ में अक्स़र ही वो रजिस्टर दिखा करता था. 
दो-तीन दिन के बाद उन अध्यापिका ने मुझे बुलाया. तकरीबन पंद्रह मिनट तक वो मुझसे बात करती रही. उसे बात की जगह डांट कहना ज्यादा सही रहेगा. और उस डांट के अंतिम शब्दों को भुला पाना मेरे लिए लगभग नामुमकिन है. उन्होंने मुझसे कहा था, कि, " अगर आप अपने टीचर के बारे में ऐसी बात कहोगे, तो आपको स्कूल से निकाल दिया जायेगा." उनकी और कोई बात तो मुझे हिला भी नहीं पायी थी, पर स्कूल से निकालने की धमकी काम कर गयी. क्रांतिकारी का भूत तो वापिस उसी हवा में विलुप्त हो गया, जिसमे से वो प्रकट हुआ था. और ग्यारह साल की वो बच्ची, घबरा कर चुप हो गयी. वो कल्पना भी मेरे लिए भयानक थी, कि कल कोई मेरे बारे मे ऐसा कह रहा हो, कि " उसे स्कूल से निकाल दिया गया है."
हालाँकि वो मुद्दा कोई इतना बड़ा नहीं था, पर फिर भी अध्यापिका ने अपनी छोटी-सी अक्षमता छिपाने के लिए एक छोटे से बच्चे को डराया-धमकाया, और उसे निडरता और सच्चाई की उस स्वाभाविक प्रवृति से दूर कर दिया, जो उसमे ज़ोर मार रही थी. मुझे अपनी स्वाभाविक अवस्था में वापिस आने में काफी समय लग गया. और तब तक वो अध्यापिका मेरे जीवन से बहुत दूर जा चुकी थी. 
इस बात को याद कर के मन में बहुत सारे सवाल उठते हैं. जैसे, क्यों हम अपनी गलतियां छिपाने के लिए किसी दूसरे को भयग्रस्त करने से भी नहीं चूकते ? अगर हम योग्य नहीं हैं, तो योग्यता का झूठा दंभ कब तक पाल पाएंगे ? और क्यों नहीं हम ये समझ पाते, कि उस झूठे दंभ को पालते हुए, हम अपने ही समाज को गन्दा कर रहे है ? 
शिक्षण-संस्थान में तो ये बात और भी अखरती है. जिस स्थान में एक बच्चे को पढ़ा-लिखा कर एक संपूर्ण नागरिक बनाने की आशा की जाती है, वहीँ ऐसा धोखा हो, तो भविष्य का स्वस्थ समाज कैसे निर्मित हो पायेगा भला ?
हाल ही में गुज़रा है शिक्षक दिवस. शायद बहुत से शिक्षकों को पुनर्मंथंन की आवश्यकता है.

शुभ-कामनाएं, भारत..!!!