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Tuesday, 10 January 2012

इस गुनगुनी धूप में . . .

सर्दियों की गुनगुनी धूप एक आमंत्रण-पत्रिका के जैसी होती है. घर के भीतर के सब काम जल्दी-जल्दी समेटकर, आँगन की ओर बढ़ने का एक न्योता आता है. और हिम-देवता के खेल के फल-स्वरूप जो स्वाभाविक जीवन धीमा पड़ गया होता है, इस गुनगुनी धूप के संस्पर्श से फिर से मुखर होने लगता है. ऐसी इस धूप में बैठना, और प्रकृति के रंगों को देख-देख हैरान होना अच्छा लगता है.
बगिया में खिल उठे गुलदाउदी, गेंदा, गुलाब और डेहलिया किसी भी प्रकृति-प्रेमी के लिए मुस्कान का विषय हो जाते हैं. भरी धूप की रौशनी इन फूलों की पंखुड़ियों के रंगों को और भी प्रखर कर देती है. चारों दिशाओं में फैली ये पंखुड़ियां इन फूलों की प्रसन्नता की कहानी कह रही-सी लगती हैं. खुद में ही सिमटे जीवन को खिलने, और फैलने की प्रेरणा देती-सी लगती हैं. धूप सेंकते-सेंकते मुझे यों याद आता है, कि कैसे एक अंगुली बराबर पौधा हम लाये थे, जो आज एक सुन्दर प्रेरणा में परिणत हो चुका है! इतना छोटा-सा था, कि उसे पौधा कहना भी कुछ अजीब ही लग रहा है.
नन्हा-सा वो एक बूटा था. उसे हाथों में उठाकर घर में लाना मन की माटी पर गहरा अंकित एक ऐसा एहसास था, जिसे मन की तरंगें ही पढ़ सकती हैं. एक नया, सुकोमल जीवन मेरे घर में प्रवेश कर रहा था. बिलकुल एक नन्हे शिशु के जैसा, जिसे गोद में उठाने का आनंद शाब्दिक अभिव्यक्ति की सीमा से परे होता है. हौले-हौले इस बूटे के नन्हे पत्तों पर मैंने हाथ भी फेरा था. उस बूटे को लाकर अपने घर की धरती में रोंपते हुए ठीक इसी दिन की कल्पना की थी, कि मेरे घर का आँगन इसकी फुलवारी से रंगीन हो उठेगा. हर दिन, जाड़ा, धूप, पानी, और मेरी आशाएं इस पौधे को सींचते रहे. धीरे-धीरे नए पत्ते फूटे. फिर कलियाँ दिखी. और एक दिन प्रकृति ने अपनी स्नेह-वृष्टि से पौधे को पूरी तरह नहला दिया, जब वो कलियाँ सम्पूर्ण पुष्प में रूपांतरित हो उठी. और अब, उस पुष्प की शोभा किसी काव्यकृति में गूंथे जाने जैसी हो चुकी है.
ये रंगों की तरंगें, उन्मुक्त प्रस्फुटन, और स्वागत भरी मुस्कान मेरे घर के आँगन में लेकर आये ये फूल-पौधे मेरे जीवन का कितना अभिन्न अंग हो गए हैं. इनका जीवन मेरे जीवन को नवीनता, आशाओं, और प्रेरणाओं से भरे रखता है. ये गुनगुनी धूप सेंकते-सेंकते, मेरा मन प्रकृति के विलास को को देखकर बस यूँ ही रोमांचित होता रहता है.

Tuesday, 27 December 2011

ये त्योहार जिया जाए...


रेत के कणों को कितना भी कस कर कैद किया जाए, एक-एक कण करते-करते, आखिर मुट्ठी खाली हो ही जाती है, बस यूँ ही, एक-एक क्षण करते, आखिर पूरा बरस भी बीत ही जाता है. बचती हैं, कुछ सुहानी यादें, कुछ कसक, कुछ टीस, और कुछ योजनाएँ. हर एक बरस की यही तो कहानी है. इसी तरह के खट्टे-मीठे, रोमाँचक अनुभवों के साथ अपनी अंतिम रात्रि की ओर बढ़ रहा है ये बरस भी. 
बीता हुआ लम्हा कितना भी सुन्दर हो, या कितना भी दर्द-भरा हो, वो होता तो बीता हुआ ही है. और आने वाला लम्हा कितनी भी सुन्दर, झिलमिल योजनाओं से लिपटा हुआ क्यों न हो, अभी उसका रंग-रूप सामने आना बाकी होता है. जितना भी जीवन है, जो भी जीवन है, अभी, इसी पल में है. उन सुनहरी यादों की चमक है, तो इसीलिए है, क्योंकि तब वो पल भरपूर जिए थे. या कुछ कसक है, तो शायद इसलिए, कि शायद कुछ पल हम जीना भूल गए थे. यादों के मुलम्मे के नीचे एक सबक छिपा रहता है. मन यादों में ही अटा रह जाता है. और सबक ताज़िन्दगी ढका रह जाता है. और बस चार ही शब्दों का तो होता है ये सबक, कि 'भरपूर जियें हर पल!' 
सुन्दर भविष्य की योजनाओं के बिना सुन्दर भविष्य का निर्माण हो नहीं सकता. और बीते पलों के सबक के बिना सुन्दर भविष्य की योजनाएँ हो नहीं सकती. इस किताब का हर अगला-पिछला पन्ना एक-दूजे से बहुत ही कलात्मक रीति से जुड़ा हुआ होता है. हर एक पन्ने पर ही सुन्दर कार्य होगा, तब ही इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो पायेंगे. जाता हुआ बरस जैसा भी रहा हो, उसकी यादों को भूलने का, और उसके सबक को याद रखने का समय आ गया है. आता हुआ बरस सँवारने का समय आ गया है.
वैसे तो सँवारने का समय हमेशा ही होता है. जिस दिन चाहें, उसी दिन दिशा-परिवर्तन हो सकता है. तो फिर ठीक अभी क्यों नहीं? बड़े-बुज़ुर्ग कहा करते हैं, कि 'एक साल तो चक्की का एक फेरा भर होता है. अभी शुरू हुआ है, अभी ख़त्म हो जायेगा.' सच, इतनी ही तेज़ी से तो बहता है ये पलों का दरिया! ये बहता चला जायेगा, हम किनारे-खड़े देखते न रह जाएँ! इस प्रवाह की गति के साथ तालमेल बिठा लें. इस दरिया के पानी की कुछ बूँदें सिर्फ अपने नाम कर लें. अपने जीवन को एक सुन्दर लक्ष्य हम दें. कुछ ख़ास बनने के लिए कुछ ख़ास करना पड़ता है. और वो ख़ास क्या है, इन लम्हों में ज़रा सोच कर देख लें! क्यों न किसी के अँधेरे जीवन में रौशनी भरने के ही लिए कुछ किया जाए! 
जाते बरस की अंतिम रात्रि शोर-शराबे में बिताने के बजाय आते बरस की प्रथम प्रभात का प्रसन्नतापूर्वक आभार किया जाए..! किसी वंचित को उसका एक सपना उपहार दिया जाए..! और जीवन का ये त्योहार जिया जाए..!

Tuesday, 13 December 2011

पहेली ही है जीवन...

पहेलियाँ बुझाना मुझे बहुत अच्छा लगता है, चाहे वो शब्दों की हों, या गणित की. एक तरह की खुजली ही होती है ये भी. जब तक सही उत्तर न मालूम हो जाए, चैन नहीं आता. फिर भले वो खुद ही मिल जाए, या किसी विशेषज्ञ की सहायता ली जाए. वैसे, अगर सही प्रक्रिया का ज्ञान हो, तो दिखने में मुश्किल पहेलियाँ भी चुटकियों में हल हो जाती हैं. पर एक पहेली ऐसी भी है, जिसको बुझा पाना मेरे लिए तो आज तक संभव नहीं हो पाया.
जीवन नामक ये पहेली बड़ी ही अजीब है. कई रास्तों से घूम-घूम कर इसकी विषयवस्तु, और प्रक्रिया समझने की कोशिश की. तथाकथित विशेषज्ञों के विचार जानने के प्रयास किये. पर परिणाम, वो तो और भी उलझाने वाले! कहीं-कहीं जीवन का रूप इतना सरल और मनोहर नज़र आता है, कि भाग्यवादी होने का मन होने लगता है. आवश्यकता से पहले ही मनचाही वस्तु सामने आ जाया करती है वहाँ. वो रूप देखकर लगता है, कि सचमुच, ईश्वरीय वरदान ही तो है जीवन! और तभी, जीवन के किसी दूसरे रूप से मुलाकात हो जाती है, जहाँ कोशिशें बहुत होती हैं. दिन-रात दिमाग के घोड़े दौड़ाना, अवसर खोजना. और नतीजे भी अच्छे ही दिखते हैं. जहाँ निशाना लगाया था, तीर ठीक वहीँ जाकर लगा. इस रूप को देखकर यकीन हो आता है,  कि कर्मक्षेत्र है ये जीवन. और इस कर्मक्षेत्र में जितना गहरा गोता होगा, उतने ही महंगे मोती मिलेंगे. ये देखकर, वो पहेली थोड़ी-बहुत सुलझने लगती है. पर अचानक ही, किसी दिन, किसी रस्ते पर जीवन का एक नया रूप दिख जाता है. दिन भर पसीना बहाना, सर्दी-गर्मी-तबीयत-हालात, हर बहाने को किनारे लगाकर, मुसीबतों के साथ रस्साकशी करना! और दिन के अंत में, प्याज के संग सूखी रोटी, हलक से उतारना! ज़िन्दगी भर गद्दे वाले पलंग पर सोने का सपना-भर देखना! वैसे किस्मत कभी-कभी अपनी पैंतरेबाजी दिखाती है इनके साथ भी! कोई झुग्गी का बच्चा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म का कलाकार बन जाता है, तो कभी कोई किसी गहरी सुरंग में गिरकर राष्ट्रीय सुर्खियाँ प्राप्त कर लेता है. और ऐसे इक्का-दुक्का को देखकर बाकी के ढेरों चेहरे उस भाग्य की ओर ताकने लग जाते हैं, जो युगों से मुँह फेरकर बैठा होता है इनसे. देश में विदेशी धन के निवेश का प्रश्न हो, या राज्यों के टुकड़े होने पर बहस हो, इनके हाथों की नियति तो झाड़ू-पोंछा ही रहनी है. जीवन का ये रूप देखकर, पिछले दोनों रूप भ्रामक लगने लगते हैं. और तभी, एक चौथा रूप सामने आ जाता है. उन लोगों का, जो भाग्य की मार तो खाए ही होते हैं, पर कर्म का भी आश्रय नहीं लेते. शायद उनका भी कोई दृष्टिकोण होता हो इसके पीछे, या शायद कुछ कटु अनुभव रहे हों, जो उन्हें सामान्य पटरी पर आने न देता हो!
इन चार रूपों को देखने-जानने के बाद, कुछ उत्तर तो नहीं मिलता जीवन की पहेली का. बस इतन ही सही लगता है, कि भाग्य अनुकूल हो न हो, कर्म का प्रतिफल मिले न मिले, जीवन रूकता कभी नहीं है. तो हम भी बस कोशिश करते रहें, चलते रहें! शायद किसी मोड़ पर जीवन के कदमों के संग हमारे कदम भी मिल ही जाएँ...!

Tuesday, 13 September 2011

अमिताभ का अमित प्रभाव...



'पञ्चकोटि-महामणि', इस लुभावने शब्द्द्वय का उद्घोष करते हुए एक बार फिर आ गए हैं अमिताभ बच्चन, कौन बनेगा करोड़पति की प्रस्तुति करते हुए. और एक बार फिर, चर्चाओं के गलियारे में पूरी तरह छा गया है उनका नाम. जहाँ एक ओर बड़ी धनराशि का आकर्षण काम कर रहा है, वहीँ दूसरी ओर अमिताभ के प्रशंसक अपने मनपसंद अभिनेता की उपस्थिति पसंद कर रहे हैं. वैसे अमिताभ के प्रशंसकों के लिए तो उनकी उपस्थिति ही किसी पञ्चकोटि-महामणि के जैसी है. अगर इस देश में कभी सर्वाधिक लोकप्रिय व्यक्तियों का कोई चुनाव किया जाए, तो कोई छिपी हुई बात नहीं है कि अमिताभ का नाम उस सूची में बहुत ऊपर आएगा. कोई उनके जीवंत अभिनय का कायल है, और कोई उनकी आवाज़ का, कोई उनकी कद-काठी से प्रभावित है, तो किसी के लिए उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही एक आदर्श है. और सिर्फ भारत ही क्यों, वैश्विक पटल पर भी उनका प्रभाव मद्धिम नहीं हो पाता. आज अमिताभ लोकप्रियता के उस शिखर पर खड़े हैं, जहाँ उन्हें देख तो सब सकते हैं, पर छू नहीं सकते. एक आम ज़िन्दगी से ख़ास मुकाम तक का उनका ये सफ़र किसी के लिए भी एक मिसाल है.
और वहीँ दूसरी ओर, कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें अमिताभ बच्चन से कोई विशेष लगाव नहीं है. हाँ, उनके प्रशंसकों को तो ये बात बहुत ही अटपटी लगेगी. पर बेशक, बहुत से ऐसे लोग हैं जो अमिताभ के प्रभाव से अछूते हैं, फिर भले ही ऐसे लोगों का वर्ग बहुत बड़ा न भी हो..! और ये सच है, कि मैं भी उसी छोटे-से वर्ग में से एक हूँ. बचपन से लेकर आज तक, पता नहीं कितनी सारी भूमिकाओं को विविधतापूर्वक निभाते हुए देखा होगा मैंने अमिताभ बच्चन को! पर फिर भी, आज तक कभी मेरी आँखों को उनके व्यक्तित्व की चकाचौंध चुंधिया नहीं पायी. अब ऐसा क्यों है, इस प्रश्न का तो कोई उत्तर नहीं है मेरे पास. स्वीकृति की बात है. यों  भी, पूरे समाज की स्वीकृति एकरंगी भला हो भी कैसे सकती है! अब वो उनका अभिनय-कौशल हों या फिर विज्ञापन-जगत में उनकी बढती पैठ, उनको मिलने वाले पुरस्कारों की संख्या, या छोटे परदे पर उनकी उपस्थिति, या चाहे उनके पूरे परिवार के साथ जुडी हुई अंतर्राष्ट्रीय ख्याति हो, पर इनमे से कोई एक भी कारण मुझे कभी उनके प्रशंसक-वर्ग की सदस्यता नहीं दिला पाया.
पर फिर भी एक बात है उनके जीवन से जुड़ी हुई, जो मेरी दृष्टि में मानवता पर निश्चय ही उनका उपकार है. मुझे याद है, आज से कई वर्ष पूर्व उनका एक साक्षात्कार टेलिविज़न पर प्रसारित हो रहा था. चैनल बदलते हुए, बस यों ही देखना शुरू कर दिया मैंने. उसमे वो बता रहे थे, कि हमारे देश के किसी एक प्रान्त के किसान ऋणग्रस्त होकर आत्मघाती प्रवृत्ति के शिकार हो रहे थे. बहुत से किसान अपने जीवन का अंत कर चुके थे, और बहुत-से और किसान उसी मार्ग की ओर उन्मुख होते नज़र आ रहे थे. केवल दो हज़ार से दस हज़ार रुपये की मामूली-सी ऋण-राशि का भुगतान कर पाने में असमर्थ ये किसान वर्षों से प्रकृति का प्रकोप सह रहे थे. और निकट भविष्य में भी, धन जुटा पाने की कोई दिशा बनती नज़र नहीं आ रही थी. ऐसे में, जीवन जीने की इच्छा का परित्याग ही उनके पास एकमात्र रास्ता था. 
अमिताभ बच्चन ने उस साक्षात्कार में बताया, कि जब उन्हें किसानों की उस त्रासदी के बारे में पता चला, तो उन्होंने बहुत से किसानों की आर्थिक सहायता करके उन्हें ऋणमुक्त कराया, और मृत्यु की ओर जाने से रोका. अपने व्यक्तिगत धन से किसानों की सहायता करके अमिताभ ने उन्हें जीवन की दिशा दी. आज ये बात याद कर मेरे मन में विचार आता है, कि अगर इस दुनिया में मानवता नाम की कोई देवी है कहीं, तो इस पुण्य कर्म के लिए निश्चय ही उन्होंने अमिताभ पर पुष्प-वर्षा की होगी. क्योंकि, ऐसा सुनकर भी असमंजस होता है, कि महज़ दो से दस हज़ार रुपये के लिए, कृषक-वर्ग अपने ही प्राण देने पर उतारू हो गया, और वो भी 'भारत' देश में, जो कि है ही कृषि-प्रधान..!!  
एक इंसान अपनी जान बचाने के लिए क्या नहीं करता! अगर कभी हम हस्पताल में पड़े किसी रोगी से मिलकर देखें, तो बातों-बातों में एक बार तो वो कह ही देगा, कि, "शुक्र है, जो मेरी जान बच गयी" या फिर, "बस ठीक हो जाऊ मैं, फिर पैसा तो भला कितना ही क्यों न लग जाए"...! अपने, या अपने परिजनों के जीवन, और स्वास्थ्य से ज्यादा महंगा हम लोगों को कुछ भी नहीं लगता. हम कुछ भी देने को तैयार हो जाते हैं, सिर्फ अपना जीवन बचाने के लिए! इतना अनमोल लगता है हमें अपना जीवन ! और ऐसे अनमोल जीवन का, महज़ कुछ हज़ार रुपयों के लिए जो अंत करने पर उतर आये हों, सोचने की बात है, ऐसी क्या बीती होगी उन किसानों के मन पर? जीवन जीने से आसान मरना जिन्हें लगा हो, खेद का विषय है, इतना संत्रास उन किसानों के हिस्से में आ गया...! एक संवेदनशील मनुष्य की आँखें डबडबाने  के लिए तो उन किसानो की भाव-स्थिति को समझना ही काफी होगा.
मृत्यु-संकट से घिरे ऐसे किसी व्यक्ति को जीवन-दान देना शायद हम सब के बूते की बात होगी. अगर हम सब अपने-अपने स्तर पर छोटी-छोटी कोशिशें भी करें, तो शायद समाज की बहुत सारी परेशानियां दूर हों जाएँ! लेकिन ऐसी इच्छा-शक्ति हर-एक में कहाँ..! अपने छोटे-से परिवार के लिए जीना तो हमें अच्छी तरह आता है, पर किसी मजबूर की मदद के लिए हमारे पास न वक्त है, न धन है, और न ही कोई योजना. सिमट चुके हैं हम सब लोग अपने-अपने पारिवारिक जीवन के छोटे-छोटे दायरों में. और उन दायरों के बाहर झाँकना आज हमारे लिए मूर्खता भी है, और अप्रासंगिकता भी.
ऐसे में, और किसी बात के लिए तो पता नहीं, पर इस बात के लिए तो, हाँ, अमिताभ ! आपके प्रेशंसक-वर्ग में शामिल होना अब मेरी मजबूरी हों चुकी है. ईश्वर आपको सदा ही इस मानवीय इच्छा-शक्ति से युक्त रखे, असहाय की सहायता के लिए. 
शुभ-कामनाएं, भारत..!!

Friday, 2 September 2011

गुलाब के प्रहरी

                     
                        गुलाब के फूल मुझे बहुत पसंद हैं. इस नाम में ही, मानो एक स्नेहिल निमंत्रण छिपा हुआ है. गुलाब के पौधे के पास पहुँचते ही उसकी मनमोहक सुगंध एक भाव-भीना स्वागत करने लगती है. रंग देखें, तो लाल, पीला, गुलाबी, केसरी..और पता नहीं कितने-सारे और..! और हर एक रंग से, कैसे एक जादुई आकर्षण टप-टप टपकता हुआ..! सुन्दरता, नवीनता, कोमलता से भरपूर, यौवन के चरमोत्कर्ष को छू रहे गुलाब को देखते ही, उन महानुभाव को धन्यवाद देने का मन होता है, जिन्होंने कभी गुलाब को 'फूलों का राजा' घोषित किया होगा. सदियों से कवि की कलम निरंतर गुलाब की सुन्दरता से प्रेरित होती रही है. कभी गुलाब की कली, तो कभी पुष्प की गरिमा पर शब्दों की पुष्पांजलि अर्पित करती आई है. और इसके उपरान्त भी, ये प्रेरणा आज तक कम नहीं हो नहीं पायी. गुलाब नित्य-नूतन होकर, हर पल एक नयी उमंग ,नयी भाव-भूमि से युक्त ही मिलता है, मुस्कुराता हुआ, महकता हुआ...! 


                       सिर्फ कवि के लिए ही क्यों, प्रत्येक मनुष्य के लिए प्रसन्नता का अमिट सन्देश लिए होता है ये सुन्दर पुष्प. नन्ही कली को देख कर आश्चर्य होता है, ईश्वर की रचना पर ! कैसी सुन्दर, सुगढ़, और मानो, रेशम की छैनी से तराशी गयी हो..! और वही कलिका, जब खिलकर एक संपूर्ण पुष्प में परिवर्तित हो जाती है, तो ईश्वर की रचनात्मकता पर आश्चर्य करने का तो साहस ही नहीं रहता. उसके असीमत्व पर स्वयं ही विश्वास हो जाता है. 

                       झुक जाता है फूल, पूरा खिल जाने पर. वह गुलाब, जहाँ रूप की परिसीमा स्वयं परिभाषित हो रही है, वहाँ भी ऐसी विनम्रता..! वाह..! एक-एक पंखुड़ी खिल-खिलकर मानो अभिनन्दन कर रही होती है जीवन का, एवं जीवन के कारक का..! या फिर, जैसे कि स्वयं ही अंजुली रूप होकर एक नि:शब्द-आभार अर्पण कर रही हो अपने रचयिता को..! क्या इससे सुन्दर चित्रण भी कहीं हो सकता है, जीवन जीने की कला का..? 

                      अलंकारों की कमी नहीं है, इस फूलों के राजा के पास. विनम्रता के साथ, उदारता का भी अक्षय भण्डार..! कितना उदार होता है ये गुलाब, जितनी भी सुगंध होती है, उसे बिना नापे-तोले, बिना संचय किये, बस उड़ेल देता है आती-जाती हवा की चादर पर..! पर फिर भी कभी रिक्त नहीं होता उसका सुगंधि-भण्डार..! 
                       पर ऐसे गुलाब को मैंने आज तक कभी भी कंटक-विहीन नहीं देखा. हर एक फूल की रक्षा के लिए, उसके इर्द-गिर्द सैकडों कंटक , एक युद्धवीर सिपाही की भाँती हर क्षण कटिबद्ध मिलते हैं.  ये देखकर मन में एक स्वाभाविक-सा प्रश्न उमड़ता है, कि जहाँ सौंदर्य की अभिव्यक्ति स्वयं को धन्य अनुभव कर रही है, वहाँ ऐसे निष्ठुर, रसहीन काँटे लगा देने की भला क्या सूझी होगी, प्रकृति को..? पर ये समझने में भी देर नहीं लगती, कि प्रकृति की सूझ-बूझ तो निराली ही है..! इतने सुन्दर पुष्प को भला कौन डाली पर लगा रहने देगा ? हर आता-जाता उसे तोड़कर उसकी सुगंध, कोमलता, और पवित्रता को अपनी मुट्ठी में भर लेना चाहेगा, कुचल देना चाहेगा..! और क्या तब, गुलाब का अस्तित्व संकट में नहीं आ जायेगा ? इसलिए, सजग प्रहरी की भूमिका निभा रहे ये कंटक हर उस हाथ को गुलाब की और बढ़ने से रोकने का प्रयत्न करते रहते हैं, जिसे नैसर्गिक सौंदर्य को नष्ट करने में ही आनंद आता है. 

                        और  ये सब सोचते ही, मुझे एक बात बहुत अच्छी तरह समझ आ जाती है, कि संसार भले ही कितना भी रंग-रंगीला, उदार, और गुणों का स्वागत करता हुआ मिले, गुणी व्यक्ति यहाँ कभी सुरक्षित नहीं है. जहां-जहां गुणों की सुगंधि, मिठास होगी, वहाँ-वहाँ उसे छीन लेने के लिए हर दिशा से चींटियों का आक्रमण हो जायेगा. ऐसे में, एक पग भी बढ़ा पाना कठिन है संसार में, अगर सुरक्षा-प्रणाली सबल न हो तो. मन भले ही गुणों की मणि से कितना भी प्रकाशमान क्यों न हो रहा हो, व्यवहार में कठोरता का आवरण धारण न किया हो, तो संसार में जीना कठिन हो जाए..! 

                       इसलिए , गुलाब को देखकर प्रेरित होना, मुस्कुराना, और सुन्दर जीवन जीने के लिए संकल्पित होना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक हम साथ लगे गुलाब के प्रहरी, काँटों को कोसते रहेंगे. सच तो ये है, कि इन्हीं काँटों की निर्दयता और कठोरता के ही कारण गुलाब का सौंदर्य और कोमलता का अस्तित्त्व बना रहता है. और ये सब देख-समझ कर विश्वास हो जाता है, कि समायोजन की कला में भी प्रवीण है प्रकृति ...!!

                       

Monday, 8 August 2011

अल्हड़ पनिहारिन


सुना भोर का गान ,
पाकर उत्साह नवीन |
सिर पर धर मटुकी ,
चली अल्हड़ पनिहारिन ||

नपे-नपे क़दमों से ,
पगडण्डी पर चाल |
हौले-हौले गुनगुना रही ,
हाथों से दे ताल ||

दायें-बाएं , कभी नीचे ,
कभी देखे आसमान |
जस की तस हरपल ,
सिर-मटुकी की शान ||

भेड़ों के झुरमुट को ,
हिला दिया रेत से |
तोड़े गन्ने दो-चार ,
जो गुजरी खेत से ||

पहुँची पनघट , मटुकी अपनी ,
सिर से दी उतार |
अपनी बारी गिन रही ,
लम्बी लगी कतार ||

और कुछ पल में ,
कुँए की मिली मुंडेर |
भर ली  मटुकी  , पीछे पलटी ,
अब घर को क्या देर ||

दिन भर में मटुकी खाली ,
भोर में वो ही सार |
रीती मटुकी भरते-भरते ,
जीवन दिया गुज़ार ||

यों मुझे कविता के नियम-कायदे तो नहीं आते, पर अपने बहुत सारे भावों को कम शब्दों में कहने का ये ही तरीका ठीक लगा.....

:- टिम्सी मेहता .

Sunday, 7 August 2011

ये जीवन और वो जीवन . .

                                बचपन में बारिशों के मौसम में सुना करते थे, कि जब बारिश होती है, तब मोर नाचा करता है. सुन-सुन कर कौतुहल हुआ करता था, कि मोर कहाँ नाचा करता होगा, कैसे नाचता होगा.. पंख फैला कर उसका नृत्य कितना भव्य लगता होगा.. ! और एक अनकहा सा इंतज़ार होता था मन में, बड़े होने का.. ! जल्दी से बड़े हो कर, कहीं से मोर का पता लगाने का.. ! और बाद में जब ये पता चला कि मोर तो जंगल में नाचता है, तो थोड़ी-सी निराशा भी हुई..! खैर, बच्चों की बचकानी सोच तो इसी दायरे में ही रहती है.
                               आज इस बात को लेकर नजरिया बदल गया है. कल तक मोर का 'नाचना' रोमांचक लगता था ! और आज , हैरत होती है ये सोचकर, कि जहां कोई देखने वाला नहीं, प्रशंसा का एक शब्द कहने वाला नहीं, वहाँ भी मोर-महाशय की भी क्या ही मस्ती है, जो कभी थमती ही नहीं.. ! मोर ही क्यों, फूलों ने कब खिलना बंद किया जंगल के एकांत में..! जहां किसी कवि ने जाकर गीत नहीं गुने उनकी कोमलता पर रीझ कर, किसी चित्रकार ने नक़ल नहीं उतारी उनकी सुन्दरता की, ऐसे किसी जंगल के नीरवता में भी ये फूल कभी मुस्कुराना नहीं भूलते. झरना अपना संगीत नहीं खोता . चिड़ियों की चहचहाट शहरी आबादी में तो भले ही आज एक भूली-बिसरी सी याद हो गयी है, पर अपने स्वाभाविक गान के लिए उन्हें कभी किसी श्रोता की दरकार नहीं रही.  कभी-कभी तो मधुमक्खियों को देखकर भी मन में अचरज होता है.. ! जिनके डंक के नाम से ही हम डर जाते हैं, ऐसी ये मधुमक्खियाँ अपने नैसर्गिक जीवन में कितनी मग्न होती हैं... ! रोज़ जाकर ताज़ा खिले हुए फूलों की टोह लेना, उनका पराग इकठ्ठा करना, और फिर उसकी शहद बनाना, इस भय से सर्वथा मुक्त, कि कोई भालू नाम का डाकू आएगा, और उनकी कड़ी मेहनत से जुटाया हुआ सारा शहद लूट कर ले जाएगा.. एकदम लयबद्ध होती हैं  ये नन्ही सैनिक.!                                                                                        
                               
                                ऐसा सुरमय है ये प्राकृतिक जीवन..! मानो, सब जीव अपने अस्तित्व के ही सम्मान में झूमते हैं, गाते हैं.. ! नीला आसमान अपनी विशालता के आनंद में झुकता-सा लगता है..! विशाल पेड़ मानो किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए हर पल कटिबद्ध लगता है, और वहीँ, कोमल लताएं उन पेड़ों से लिपट कर मानो निर्भय-सी हो जाती हैं. कहीं कोई किसी को सम्हाल रहा है, वो भी बिना किसी दंभ-प्रदर्शन के, और कहीं कोई सहायता ग्रहण कर रहा है, तो कृतज्ञता का एक शब्द भी ज्ञापित किये बिना..! ऐसा है ये वनांचल.. पवित्र, निर्मल, और जीवन से परिपूर्ण...! हाँ, हिंसक पशु भी होते हैं वहाँ, पर वो भी तो तथाकथित प्राकृतिक व्यवस्था के अंतर्गत अपना कर्त्तव्य कर रहे होते हैं. जहां तक नियमबद्धता की बात है, तो उसमे तो वो हिंसक जीव भी कोई चूक नहीं करते दिखते. सब अपना प्राकृतिक जीवन एक उत्सव की तरह जी रहे लगते हैं. कितनी उदारता है इस प्रकृति की स्नेहिल गोद में ..!
                                ये तो हम मनुष्य ही है, जिन्हें महंगे से महंगा भोग भी तब तक अच्छा नही लगता, जब तक उसे सब लोग देख न लें..!  कभी-कभी ऐसा लगता है, कि विकास के इतने ऊंचे सोपान पर खड़ा होने के बाद भी मनुष्य बौना रह गया है, एक नन्ही-सी चिड़िया के आगे ..!! 


टिम्सी.